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Wednesday, July 8, 2015

"अवसाद "




मेरे  हाथ आ  लगा है
फिर वही चाक़ू !
कल ही की बात है-
जाने किस पर तो ,
पूरे चार बार घोंपने के बाद ,
पसीने से तर बतर
मैं नींद से उठ बैठी थी। 

याद है ना तुम्हें !
पिछली बार तो
पर्स में से निकाल ली थी बन्दूक !
फ़िर तो गोली की आवाज ही से
खुली थी नींद मेरी !
कई दिनों तक फ़िर
मेरे बालों में उंगली फ़िरा
तुमने उगाए थे फ़ूल
मेरे अन्तरमन में ।
और वो बन्दूक, वो चाकू
तुम्हारी फ़ूंक से
हवा हो गये थे !
आ बैठी थी, मेरे जहन में
किसी बंसी की मीठी सी धुन।
फ़ैल गया था उजास।
दूर दूर, आस पास।
जहाँ तक जाती थी नज़र ,
नजर आते थे कितने ही इन्द्रधनुष !
और तभी !
फ़िर तभी सूरज डूब गया !
इस बार अँधेरा
बहुत बहुत गहरा।
दिखते हैं गीत न हवा !
न महकते हैं चाँद तारे !
सजते नहीं हैं ख़्वाब भी अब।
सूनी सूनी  हैं महफिलें ,
चुप चुप हैं तन्हाईयाँ सब।
समय के भी ज्यों ,
कांटे निकल आये हैं। 
आंसुओं की  नदी के
पेटे निकल आये हैं।
मुस्कुराहटें भी
अजनबी अजनबी !
              -------------- मुखर !
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