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Friday, June 22, 2018

“अपशब्द”


वह नई नई लेखिका लघुकथाएं लिखती है . कथाओं के केंद्र में होते हैं बड़े मासूम से सवालात . क्या करे , जिंदगी में अनुभव का घेरा जितना था वही तो झलकेगा लेखन में . हाँ , सोचती बहुत है. गहराई से एकदम . सपने एकदम नादान से उसके. जैसे हँसते हुए फूलों की क्यारियां , चहचहाती सुबह और गुलाल से नहाई शाम हो, सबकी आँखों में तारों भरा आसमान देखना चाहती है . तो नतीजा यह हुआ कि उसकी कथाओं में जो ग्रे शेड के पात्र होते हैं न वो भी उतने ही क्यूट ! मतलब हर कहानी का अंत सुखद और पाठक का मन हल्का हल्का ! 
लिखने पढ़ने का अंजाम यह हुआ कि अब हर जगह आँखें खोले सब देखती रहती है . अख़बारों में भी खोद खोद कर हालात तौलते रहती है . अब अख़बार तो अख़बार ही होता है , सो कई बार मन उद्देलित हो जाता . बलात्कार की ख़बरों से तो उसका मन चित्कार कर उठता है . समाज के इस रूप की तो कल्पना भी नहीं थी . पर वह जानती है हर समस्या का हल होता है . उसने इसका भी एक समाधान ढूँढा . कहना तो कहानी ही के रूप में था न ? सो उसने कथावस्तु सोचा, पात्र गढ़े और लिखने लगी संवाद . अब बात यह थी कि इतने काले पात्र के संवाद भी तो अपशब्दों से भरे होने चाहिए ? और लेखिका इस क्षेत्र में एकदम जीरो ! ऐसा नहीं कि वह कभी सुनी पढ़ी नहीं थी गालियाँ , मगर कभी मन में भी नहीं दोहराया था उन वाहियात शब्दों को . हद से हद वह साला , गधा या स्टुपिड ही कहती . अब क्या करें ? उसने इसका भी समाधान निकाला .
“सुनो ! मैंने आज जो कहानी लिखी है न वह तुम्हें एक शर्त ही पर दिखा पाऊँगी !”
“वो क्या ?”
“मैंने संवादों के बीच बीच कुछ ‘खाली स्थान’ छोड़ दिए हैं , वह तुम भर दो , मुझसे नहीं हो रहा !”

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Wednesday, June 13, 2018

"समय की नब्ज़ पर हाथ " - पुस्तक समीक्षा

 पुस्तक समीक्षा
पुस्तक  - मेरी जनहित याचिका एवं अन्य कहानियाँ
लेखक  – प्रदीप श्रीवास्तव  
मुल्य – 350/-
प्रकाशक – प्रदीप श्रीवास्तव , ई -6 एम/212, सेक्टर ‘एम’अलीगंज , लखनऊ 226024
संस्करण – 2018 , पेपर बैक
समीक्षक – कविता “मुखर”, जयपुर
कहानियाँ जिसे कथाकार ने अपनी शिल्पकला के साथ कुछ इस तरह शब्दबद्ध किया है कि आम ज़िन्दगी में कई तहों में बुनी हुई समस्याओं से रूबरू होता है पाठक . पारिवारिक, सामाजिक , आर्थिक , और मनोवैज्ञानिक समस्याओं पर केन्द्रित ये कहानियाँ पाठक को चौंकाती हैं तो कई बार नि:शब्द भी कर देती है . पीढ़ी दर पीढ़ी जमीन , खेत संग अपनापन भी बंटता चला जाता है और ज़िन्दगी से विरक्त हुए शहरी मध्यमवर्ग महंगाई, दहेज़, शिक्षा, बेरोजगारी आदि कठिनाइयों के बीच नट सा संतुलन बनाने की जुगत में खो रही संवेदना , बढ़ती अराजकता, स्वछंदता , अनैतिकता को रेखांकित करती हैं ये कहानियाँ .
दस बेहद लम्बी लम्बी कहानियाँ समेटे 464 पन्नों की यह पेपर बैक मोटी पुस्तक पाठक के मर्म को छूती, उसको सोचने पर मजबूर कर देती है . प्रदीप बहुत ही सहजता के साथ कहानी का वातावरण बुनते हुए विषय में प्रवेश कर जीवन की आम घटनाओं को पिरोते हैं. सुख दुःख , प्रेम त्याग आदि रूप में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हुए जीवन बाज़ारवाद , राजनीती , कुप्रथाओं , सामाजिक मान्यताओं के मकड़जाल में फँसा महसूस होता है.
पुस्तक की पहले के सवा सौ पन्नों की कहानी “मेरी जनहित याचिका” बताती है कि कानून का दुरूपयोग अच्छे खासे परिवार को किस तरह तोड़ कर बिखेर देता है . शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलती यह कहानी सामाजिक वर्ण व्यवस्था के चंगुल में फंसे प्रतिभावान पात्र ज़िन्दगी के कड़वे अनुभवों, कश , मय और सेक्स रैकेट के दलदल में धंसते हुए भी सब कुछ सुधार देने का स्वप्न आँखों में पालते जीते हैं , मरते हैं.
एक दृश्य में सिमटी आत्मालाप की शैली में रुसी कथाओं की याद दिलाती दूसरी कहानी “पगडण्डी विकास” में लेखक के सृजनकर्म में विचार और संवेदनाओं का गहरा रिश्ता दिखता है . चित्रात्मक शैली में दिल्ली और महोबा की सर्दी का वर्णन तथा सीधी सरल बीवी का दब्बू और डरपोक पति को हिदायतें सरस व् सहज है. देश की राजनीति पर लेखक की पैनी नजर दो पात्रों के कसी हुई बहस के माध्यम से व्यक्त होती है जिसमें पाठक पढ़ते पढ़ते खुद भी तीसरे पात्र के रूप में उलझ जाता है . गाँधी जी का जो “देश का बंटवारा उनकी लाश पर होगा” सन्दर्भ दिया है उसपर और चिंतन की आवश्यकता है . लेखक द्वारा “पगडण्डी विकास” की अवधारणा बेहद तार्किक है .
कहानी “जब वह मिला” में दोस्ती की खातिर, बीवी का प्रेम और परिवार में सबकी ख़ुशी की खातिर नायक क्या नहीं कर सकता ! मगर यह ख़ुशी का दायरा अपनों से कहीं आगे निकल गया . बेहद सरल शब्दों में यह कहानी प्रवाहमई है . पति पत्नी के बीच मीठी चुहलबाजी संग कुछ दिलचस्प दृश्यों को लेखक ने रचकर धन के बल पर चलने वाली व्यवस्था पर कुठाराघात करते हुए लाश पर होते खेल की अतिशय संवेदनहीनता बयां की है .
कहानी “करोगे कितने और टुकड़े” में पात्र एक ख्यातनाम लेखक है जिसके एकालाप में सारी कहानी सिमटी हुई है जो पाठक की विचारधारा को परिष्कृत करती है कि वह लेखक के साथ है या विपक्ष में . पर इसी बहाने ‘भारत माता’ की कल्पना तथा उनसे वार्तालाप द्वारा देश की राजनीति और साहित्यकारों का कर्तव्यों पर कई तथ्यों का खुलासा अच्छी खासी बहस के रूप में है . लेखक की विचारधारा से असहमत होते हुए भी कथावस्तु ने उन बहसों में उलझा लिया मुझे. साहित्यकार का कर्तव्य बेशक समाज को , लड़खड़ाती राजनीति  को राह दिखाना है मगर सच बात तो यह है कि उसके विचार निष्पक्ष दिखने भी चाहिए. पात्र अपनी लालसा, “विराट उपन्यास को जग प्रसिद्धि”, के लिए कायरता भरा कदम उठाता है ! कथाकार का मंतव्य स्वागतयोग्य है कि लेखक को बोलने की हिम्मत जुटानी होगी , उसकी जिम्मेदारी के अहसास को , उसके हिम्मत को दर्शाती है ये कहानी है .
स्त्री पुरुष के अंतर्संबंधों में आए बदलावों के परिणामस्वरूप एक स्त्री के संघर्षों की कहानी है “झूमर”. यह कहानी है तलाक के लिए अदालती चक्कर, भरण पोषण देने से बचने के लिए पुरुष की नीचता के हद तक गिरने की . वकीलों की लिजलिजी आँखों की व किसी भी तरह पैसे ऐंठने की है कहानी झूमर . झूमर कहानी है उस स्त्री द्वारा  इन सबसे लड़कर आगे निकल अपनी बेटी को लाड प्यार से पालने पढ़ाने की , समाज का सामना करने को तैयार करने की . सहज भाषा में बारीक वर्णन पाठक को सीधे दृश्य पर ला खड़ा करता है . एक संतान हो जाना स्त्री को विवाह में इतना जकड़ देता है कि झूमर कह उठती है , “मैं इधर की रही न उधर की !”
 “घुसपैठिये से आखिरी मुलाकात के बाद” कहानी में केंद्र बिंदु के विषय से इतर वातावरण को भी विस्तार दिया है जिससे नायक की मनःस्थिति का खाका खिंच जाता है. अख़बारों में प्रबंधन का हस्तक्षेप, ख़बरों से ज्यादा विज्ञापनों पर जोर , सत्ता और मिडिया का गठबंधन आदि की विवेचना यथार्थ एवं प्रभावी है. उत्तम पुरुष में लिखी गई यह कहानी बताती है कि पति का सरनेम , पति की धौंस , पति पर निर्भरता महानगर की इन महिलाओं के लिए बीते दिनों की बात हो गई . यहाँ तक कि विवाहेतर सम्बन्ध बनाने में भी ये पुरुषों से पीछे नहीं हैं. एक बार फिर कहना होगा चित्रात्मक शैली ने मन मोह लिया . वो मूसलाधार बारिश, वो झोपड़ी , वह बाइक की स्थिति सब जैसे आँखों के सामने घट रहा हो . बंगलादेशी घुसपैठियों की ख़बर से कहानी में दिलचस्प व चौंका देने वाला मोड़ आ जाता है . नायक की असमंजसता भरी मन:स्थिति पर कहानी का अंत कर देना पाठक के लिए विचारोत्तेजक हो जाता है . हर परिस्थिति को अपनी सुविधानुसार मोड़ मरोड़ लेने वाला यह नायक अचानक इतना देशप्रेमी कैसे हो गया ?  
विकास के नाम पर आई बाज़ारवाद की आँधी में टूटते परिवार की कहानी ‘बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा’ में पिरोई हुई यह स्त्री पात्र ‘बिल्लो’ पूरी दबंगता से दिल-ओ-दिमाग पर छा जाती है . ‘अहा ग्राम्यजीवन’ में विकास की घुसपैठ के बावजूद लेखक ने साफ किया है कि मेहनतकश के लिए गाँव में रहना अधिक आनंदकारी तथा संतोषजनक है . यह भी कि पूर्वाग्रहों से एक शहरी किसी ग्रामीण के तुलना में अधिक ग्रसित है .   
एक परिवार , माता पिता कैसे अपने जिगर के टुकड़े से मात्र इसलिए मुख मोड़ लेते हैं क्योंकि उसका शरीर सामान्य लिंगवर्ग का नहीं है, थर्ड जेंडर का है . थर्ड जेंडर के मुद्दे पर जहाँ शायद ही कभी कोई गिना चुना साहित्य मिलता है. कहानी, “हनुवा की पत्नी” पाठक को समाज के इस अभिन्न अंग के प्रति समाज के दोगले रवैये से परिचित कराती है . महानगर में मध्यमवर्गी परिवार के लिए जहाँ बाजारवाद, कुप्रथाओं व सामाजिक मान्यताओं से जीना जटिल हुआ जाता है, किराये का घर और बच्चों की पढ़ाई तक के लिए जद्दोजहद हो फिर शादी ब्याह तो दूर की कौड़ी हो जाता है. इन सभी चक्कियों में पिसती युवा पीढ़ी बेरोजगारी के धक्कों ही में पल बढ़ रही है . ऐसे में लड़की होना स्थितियों को बदतर कर जाता है . फिर हनुवा के दुख दर्द की तो इन्तहां ही हो गई . संघर्षशील जीवन के विभिन्न मोड़ पर बार बार अपना पूरा व्यक्तित्व बदलती हुई हनुवा को पहाड़-से दुःख के बीच अपना खोया हुआ पुराना अस्तित्व ही फिर से नहीं मिलता बल्कि साथ एक पत्नी भी मिलती है. पूरी कहानी में सागर मंथन से निकले मक्खन की तरह खूबसूरत इंसान निकल कर आते हैं .
“शकबू की गुस्ताखियाँ” के माध्यम से दो दोस्तों की यारियां , जीवन के उतर चढ़ाव , अच्छे बुरे में बिना किसी पूर्वाग्रह के , बेशर्त प्रेम दिखाया है. दो अलग अलग धर्म के लोग भी कितने प्रिय दोस्त हो सकते हैं , यह कहानी एक उत्तम उदाहरण है . मन की बेलगाम इच्छाएं धर्म व् कानून को हथियार रूप में प्रयोग परिवार को बर्बाद कर देता है , आँखों की शर्म ख़त्म हो जाती है , ज़िन्दगी जहन्नुम हो जाती है और आदमी तिलतिल मरता है. कहानी सियासी चालों द्वारा भारतवंशियों को बाँट दिए जाने , रंजिशों के बीज बो दिए जाने की ओर इंगित करती है. मुस्लिम दोस्त की छह पीढ़ियों का ‘सच’ उजागर करना गड़े मुर्दे उखाड़ने जैसा है . उस तरह से तो हम सबकी जड़ अफ्रीका के आदम तक और उससे भी आगे एकल कोशिका तक चली जाएगी .
पारिवारिक तानेबाने को तोड़ स्वच्छंद जीवन जीते एक जवान की कहानी “शेनेल लौट आएगी” में यह समझना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है कि कौन लुटा और कौन लुटेरा . कहानी का अंत दिलचस्प . पाठक के जहन में पूरी कहानी दोबारा घूम जाती है .  
गंभीर कथावस्तु को संप्रेषित करने के लिए आम बोलचाल की भाषा सर्वोत्तम है. रोजाना की ज़िन्दगी में एक आम व्यक्ति तह दर तह कई समस्याओं से एक साथ जूझता कैसे दिन बिताता है यह बात पाठक के जहन में मक्खन की उतरती जाती है . पुस्तक की प्रमुख खासियत यह है कि अधिकांश कहानियों के मुख्य किरदार में एक सशक्त नायिका है. दूसरी मुख्य बात कि चंद पंक्तियों ही में इतने सारे मोड़ , इतनी सारी बातें होती हैं कि पाठक कई मोर्चों पर लामबंद होता जाता है . इन कहानियों के माध्यम से आज के समाज का सबसे कड़वा पक्ष जो सामने आया है वह आज के युवा का पूरी तरह बिगड़ा होना भी कितना सामान्य है . नायकों में वे सारी ‘खूबियाँ’ हैं . बाइक , स्पीड , शराब, सिगरेट , अनैतिक शारीरिक सम्बन्ध फिर भी सामाजिक स्वीकारिता ! और हाँ , ये ‘खूबियाँ’ लड़के लड़कियों के भेदभाव से परे समान रूप से हैं . जिस प्रकार से असंख्य मुद्दों को लेखक इस पुस्तक में समेटा है, इसे एक बेहद जटिल पुस्तक हो जानी चाहिए थी , परन्तु सरल भाषा और बोधगम्यता के कारण पाठक को वो सारे समीकरण न सिर्फ आसानी से समझ आते हैं बल्कि अत्यंत रुचिकर भी बन पड़े हैं . सुना है कि असली भारत देखना हो तो गांवों में जाओ , यह पुस्तक “मेरी जनहित याचिका एवं अन्य कहानियाँ” पढ़ कर लगा कि मात्र गांवों में जाने से नहीं होगा , अच्छी किताबें अधिक मददगार होती हैं !
धन्यवाद् लेखक मुझे यह मौका देने के लिए .
कविता ‘मुखर’
जयपुर



Tuesday, May 29, 2018

हिन्दी का पोस्टर बॉय-


निखिल सचान! नाम तो जानते ही होंगे आप! नहीं जानते? कोई बात नहीं, ये CB से आगे के हैं। CB नहीं पहचाना? अरे! भगत चेतन! तो क्या हुआ जो ये भी आई आई टी, आई आई एम हैं! यूँ ही नहीं इनकी पहली किताब, “नमक स्वादानुसार” और दूसरी किताब “ज़िन्दगी आइस पाइस” क्रमशः 2013 व 2015 की हिन्दी की बेहतरीन पुस्तकों में से एक रही, BBC और आज-तक मीडिया व critics अनुसार. 
तो हुआ यूँ कि प्रभा खेतान फ़ाउंडेशन की ओर से प्रायोजित 'कलम दैनिक भास्कर संवाद' में इस इकत्तीस वर्षीय हिन्दी साहित्य के आउट साइडर को सुनने मिलने का मौका मिला।
इनकी ये पहली दो किताबें कहानी संग्रह हैं। ये पहले जो किताब लाना चाहते थे वो “यूपी65” अब आई। वो इसलिए कि इन्हें डर था कि कहीं इनकी पहली किताब पढ़ कर इनके ऊपर CB का ठप्पा लगा कर एक तरफ़ कर दिया जाए। सो वे दोनों किताबें सारे स्टीरियोटाइप को तोड़ने का काम किया है और ये आउट साइडर हिन्दी साहित्य के नए रंगरूटों में सबसे चहेते यानी कि पोस्टर बॉय बन गए! 

अब यह पहला उपन्यास “यूपी65”। नहीं नहीं, इसमें “अब तक छप्पन” जैसा कुछ भी नहीं। यह तो बिल्कुल मेरे शहर RJ14 जैसा है अर्थात शहर का RTO नंबर। जी हाँ, यह “UP65” बनारस का RTO कोड है । यूँ तो बनारस पर कई किताबें लिखी गईं, पिक्चर भी बनी तो इन पर दबाव तो था पर फ़िर अपना फॉर्मूला भी तो आजमाना ही था। बकौल लेखक, लिखना अर्थात् कछुए की तरह बस अपने तक सीमित हो जाता हूँ, रात 11:30 से 2-3 बजे तक लिखना, फ़ैमिली टाइम भी स्वाहा तो फ़िर अपने लिए ही लिखना होता है, पाठक के लिए नहीं। कॉपी पेन का जमाना गया, सीधे टाइपिंग।
“यूपी65” बी एच यू में पढ़ने वाले चार दोस्‍तों की कहानी है। कहानी लिखते हुए इसके पात्र अपने सही नाम से थे, कहानी पूरी होने पर काल्‍पनिक नाम रखे गए।
कार्यक्रम के मॉडरेटर ख्यातनाम साहित्यकार/आलोचक दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी ने लेखक और उपन्यास से परिचय कराते हुए कहा कि “यू पी 65” में असहिष्णुता की समस्या को बड़े संयम से उठाया गया है। फेमिनिज्‍म का वर्तमान चेहरा उभरता है। और जिस प्रकार “चंद्रकांता संतती” पढ़ने के लिए लोगों ने हिन्दी सीखी और फ़िर गंभीर सहित्य की ओर मुड़ गए वैसे ही आज जब नई पीढ़ी ने हिन्दी साहित्य से किनारा कर लिया इस उपन्यास का प्रयास है उनके हाथों में हिंदी की किताब आए।
इस उपन्यास से एक पाठक क्या सीखेगा? किसी दर्शन का अभाव है इसमें!
निखिल : करोड़ों अरबों की जनसंख्या है और भावनाएँ वही पाँच सात। कोई रोटी के पीछे, प्रेम, धन, सत्ता, अध्यात्म के पीछे ही तो भागता है। इन भावनाओं से भाग कर नए सिद्धांतों की बात क्यों ढूँढते हैं? हमें बहुत ज्यादा बौध्दिक होने से बचना चाहिए। किताब जहाँ से आई है (बीएचयू कैंपस) के प्रति सच्चा हूँ।
आज की नई पीढ़ी किसी सहित्य अकादमी के विजेताओं के नाम जानती नहीं /याद नहीं।
यह किताब इस ख्वाहिश में है कि ये आपको बे-इंतहा हँसाए, बनारस ले जाए और आपके ज़िन्दगी के सबसे सुकून भरे पलों से मिलवाए।
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हम पर तो ये बरस भोले बाबा का विशेष आशीर्वाद है!
- मुखर


Friday, May 18, 2018

"दवाई वाली मैडम" - एक परिचय

महाकवि सुमित्रा नंदन पन्त ने कहा है , “ सुमन सुंदर , सुंदर है विहग, मानव तुम सबसे सुंदर !” आज का यह दिन है कि मैं सुंदर मानव में से सुंदरतम का परिचय पत्र पढने जा रही हूँ .   
पिछले पच्चीस वर्षों से जे के लोन अस्पताल व एस एम् एस के रेडियो थेरेपी विभाग में सोम से शुक्रवार तक प्रतिदिन दो घंटे निशुल्क परामर्श देने व जरूरतमंद मरीजों को निशुल्क दवा व्यवस्था करने के लिए “दवाई वाली मैडम” नाम से विख्यात सुश्री कमला पानगड़िया जी ने  अध्यापन व समाज सेवा को पुर्णतः समर्पित हो अंजाम देने खातिर विवाह ही नहीं किया .
पांच हज़ार छात्राओं का निशुल्क नेत्र जाँच करवा चश्मा दिलाया. जन चेतना कार्यक्रम, जाँच शिविर , परिवार नियोजन व् साक्षरता अभियान में योगदान .
- कक्षा कक्ष, सीवर लाइन, फर्नीचर , बिजली फिटिंग , २५० बालिकाओं को स्वेटर , फ़ीस व्यवस्था आदि के करीब बीस लाख के काज स्वयं द्वारा तथा जनसहयोग से पूर्ण कराया.
महावीर इंटरनेशनल पिंकसिटी की उपसचिव एवं प्रभारी औषध बैंक , कमला जी रेड क्रॉस सोसाइटी , जैन महिला गृह उद्योग , जैन वैश्य संगठन , जयपुर कैंसर सोसायटी , राजस्थान कैंसर सोसायटी  व् कई संस्थाओं की स्थाई सदस्य भी हैं.
1994 में राष्ट्रपति पुरस्कार तथा उसके पिछले वर्ष राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित कमला जी को विशन सिंह शेखावत पुरस्कार, रेड क्रॉस सोसायटी द्वारा स्वर्ण पदक , एड्स रोग संसथान , अल्प बचत विभाग , कुष्ठ रोग संसथान , लायंस क्लब , श्वेताम्बर महिला संगठन आदि आदि द्वारा कई कई बार सम्मानित हुईं .
95 ऍफ़ एम् तड़का “वीमेन रिकग्निशन अवार्ड 2015 में सुश्री कमला पानगड़िया जी “हार्ट ऑफ़ गोल्ड” से नवाजी जा चुकी हैं .
सर्वश्रेष्ठ परीक्षा परिणाम देने वाले विद्यालय की भूतपूर्व प्राचार्य, आदर्श अध्यापिका ,जरूरतमंद व् मरीजों के लिए दया ममता की प्रतिमूर्ति तथा हम सबके लिए प्रेरणास्रोत आदरणीय कमला पानगड़िया जी का मैं करबद्ध अभिनन्दन करती हूँ . आज , राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान आपको कर्मश्री सम्मान से सम्मानित कर स्वयं गौरवान्वित महसूस कर रहा है .
सौ बात की एक बात कि
“ अगर चराग भी आँधियों से डर गए होते ,
सोचिये कि उजाले किधर गए होते !”
राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान की शुक्रगुजार हूँ मुझे सुश्री कमला जी का परिचय पत्र पढने का सुनहरा मौका देने के लिए . 
शुभ दिन !




Monday, April 23, 2018

Meeting eminent author Kashinath Singh ji

एक अप्रैल को सियालदाह पकड़ी थी तो चार की रात मरूधर से वापस पहुँच गई अपने शहर, मग़र इन साढ़े तीन दिनों में जो यात्रा अनुभव हुए वो अपने आप में अनूठा है। भारत बंद की वजह से यह अनुभव कई गुना eventful हो गया। 
एशिया का सबसे बड़ा गाँव, एशिया का सबसे बड़ा, 9किमी, रेलवे यार्ड, एशिया का सबसे बड़ा रिहायशी विश्वविद्यालय, एशिया का सबसे बड़ा विश्विद्यालयी संग्रहालय... सब घूमी!
गंगा स्नान, अस्सी के घाट की महा आरती देखना, फौजियों के गाँव के कामख्या मंदिर में देवी को चढ़े नवरात्रि की चुन्नी का मुझे ओढाया जाना... अलौकिक अनुभव!
मग़र आज जो मैं ख़ुशी आपसे बाँटने जा रही हूँ वह मेरे लिए इन सबसे बढ़ कर है!
काशी में उतर कर अस्सी के घाट पहुँचने तक मुझे "काशी का अस्सी" के लेखक जो याद आए तो उनसे मिलने की उत्कंठा लिए पहुँच गई बी एच यू के मुख्य दरवाजे पर (शायद सिंह द्वार)!
चौकी के पुलिस ने कहा गार्ड से पूछो... गेट के पुलिस ने कहा वो नहीं गार्ड अंदर है... गार्ड ने कंट्रोल रूम के नंबर दिए... कंट्रोल रूम ने पी. आर. ओ. के, पी आर ओ ने हिंदी डिपार्टमेंट के... फ़िर फ़िर से सारे कॉल... आख़िरकार माननीय लेखक के फोन नंबर तथा पता मिल ही गया !
उन्हें फोन किया तो उन्हें मेरे द्वारा पूछताछ की ख़बर लग गई थी, दे दिया समय तीन बजे आने का! 😀
हाँ, मैं "उपसंहार" और "काशी का अस्सी" पढ़ी हूँ! उन अंतराष्ट्रीय ख्यातनाम लेखक सपत्नी के चरण रज ले पाना मेरा सौभाग्य है।
मैं तो क्या बोलती, उन्होंने ही बहुत कुछ पूछा, बताया, समझाया और मरगदर्शन किया।
"कहानी कथाओं में मुझे बेहद रुचि है, मैं तुम्हारी किताब पढूंगा!" कह कर उन्होंने मेरी पुस्तक "तिनके उम्मीदों के" को उलट पुलट कर पूरा देखा और मुझे उसमें कुछ लिखने को dictate किया.
"फोन नंबर जरा बड़े बड़े लिखना!"
उन्होंने "रेहन पर रघ्घू" भी पढ़ने को कहा।
"क्या क्या देखा बनारस में? बी एच यू नहीं घूमी? यहाँ से सीधे वहीं जाना... एक ऑटो करो और पूरे परिसर में चक्कर लगाना। भीतर ही विश्वनाथ मन्दिर भी देखना... और भारत कला भवन भी।"
आधे घंटे की वह मुलाकात तथा प्रेमपगी आवभगत अविस्मरणीय है!
" हे विश्वनाथ ! मुझे फ़िर बुलाना काशी!"
- मुखर

Tuesday, March 27, 2018

सुनहरी दोपहरी

हालाँकि जम्मू और हिमाचल में बर्फबारी हुई है और सुबह की ठंडक बाकी है परन्तु मरुस्थल में आते सूरज की किरणें जेठ सी चमकीली हो गई है! अभी दिन के बारह भी नहीं बजे हैं और फिजां में दोपहर की गंभीरता पसर गई है।
पॉश इलाके की इस कॉलोनी में ऊँचे बड़े बंगले खड़े खड़े ऊँघ रहे हैं और साफ़ सुथरी सड़कें अलसा रही हैं। अनगिनत लोगों की यह बस्ती है मग़र दिखता कोई नहीं। निर्जन सी दोपहर की नीरवता और मंद मंद पवन मुझे बालकनी की तन्हाई में खींच लाते हैं। छोटे बड़े सभी वृक्ष ज्यों थोड़ी थोड़ी देर में उनींदी करवट लेते हिलते हैं... सड़क की दोनों ओर पंक्ति बद्ध अशोक पर नए जवान पानीदार पत्ते बूढ़े पत्तों को हाशिये पर धकेल नव वर्ष के आगमन पर नई छटा अब तक बिखेर रहे हैं। ये सीटी ! किसने मारी? अहा! बिजली के ऊँचे तार पर अंगूठे भर की एक नीली चमकीली नन्ही चिड़िया! इसकी चोंच भी सुई सी पूंछ भी! दो पीली तितलियाँ पल भर में कहीं से आ कहीं को छू! मेरी नजर नचा गईं, मुस्कान दे गईं... बता गईं कि बसंत अभी बस गया ही है...
नजदीक ही कहीं से हैमर ड्रिल की तीखी आवाज और ठक ठक... ह्म्म! शहर के बसावट की जड़ें इतिहास में कहीं दबी पड़ी है और निर्माण अभी जारी है। फिर भी... इस मौसम में कमठे की आवाज भली लगती है, जाने क्यों!  ओह्ह फ़ोन!
"जी भैया!"
"रात की बस है, दस बजे! टिकिट ले लूँ?"
"जी भैया! जी।"
मरुस्थल में आठ नहीं दो ही ऋतुएँ होती हैं भयंकर गर्मी और गर्मी! बाकी सब दो दो दिनों की मेहमान की तरह आती हैं... उन तितलियों की तरह... उनकी झलक पाने को ऎसे ही कुछ पल चुराने होते हैं... अकेले...
- मुखर 24/3/18

अन्तरजाल - एक चाकर

"मैडम, एक बात बताओ, ये नेट पर जो दिखाते हैं वो क्या सब सच होता है?" - बर्तन धोती रुक बाई जी ने पूछा।
मैंने खौलते पानी में अदरक डालते हुए पूछा, "क्यों? क्या देख लिया ऎसा?"
"पाँच छह बरस के बच्चे को एक माँ बुरी तरफ पीटती देखी हमने, जी दोहरा हो गया।"
वह जानती थी गई अब कम से कम दस मिनट की। 😬
" बाई जी! ये दुनिया इतनी बड़ी है कि सब जगह सब प्रकार की चीजें होती रहती हैं। पहले गाँव में भी हम औरतें कहाँ सबको जानतीं थीं। चारदीवारी, पड़ोसी, पनघट, जंगल पानी की चार सहेलियाँ, बस।" मैंने चाय छान कर एक कप उसे पकड़ा दिया।
"गाँव में प्रसव से एक मौत की ख़बर आती है तो कितना बुरा लगता है!
राजस्थान में 45000 गाँव हैं। रोजाना की दो चार मौत की ख़बर मिले तो या तो दहशत बैठ जाए या संवेदनहीन हो जाएं!
कोई माँ अपने बच्चे को यूँ ही तो नहीं मारेगी ना... कितना frustration होगा,आख़िर किसपे ज़ोर चले उसका?
हो सकता है सच ही हो! और राजनीति से संबंधित, जात पांत से संबंधित बातें लगभग झूठी खबरें ही होती हैं।" मेरे हाथ से खाली कप ले वह फ़िर बर्तन धोने लगी।
" नेट पर... इस दुनिया में इतना रोना धोना/ ग़लत बातें हैं कि जन्मों देखते रहो, रोते रहो।
आप तो नेट पर अच्छी अच्छी बातें ही ढूंढा देखा करो।"
ये नेट काँच का वो तिलिस्मी पात्र है कि जैसा मन में भाव हो वैसी ही चीज/बात हाथ लगेगी !
- मुखर
नोट - राजस्थान में 44794 (2011) गाँव हैं यह बात भी गूगल ही ने बताया!