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Friday, May 18, 2018

"दवाई वाली मैडम" - एक परिचय

महाकवि सुमित्रा नंदन पन्त ने कहा है , “ सुमन सुंदर , सुंदर है विहग, मानव तुम सबसे सुंदर !” आज का यह दिन है कि मैं सुंदर मानव में से सुंदरतम का परिचय पत्र पढने जा रही हूँ .   
पिछले पच्चीस वर्षों से जे के लोन अस्पताल व एस एम् एस के रेडियो थेरेपी विभाग में सोम से शुक्रवार तक प्रतिदिन दो घंटे निशुल्क परामर्श देने व जरूरतमंद मरीजों को निशुल्क दवा व्यवस्था करने के लिए “दवाई वाली मैडम” नाम से विख्यात सुश्री कमला पानगड़िया जी ने  अध्यापन व समाज सेवा को पुर्णतः समर्पित हो अंजाम देने खातिर विवाह ही नहीं किया .
पांच हज़ार छात्राओं का निशुल्क नेत्र जाँच करवा चश्मा दिलाया. जन चेतना कार्यक्रम, जाँच शिविर , परिवार नियोजन व् साक्षरता अभियान में योगदान .
- कक्षा कक्ष, सीवर लाइन, फर्नीचर , बिजली फिटिंग , २५० बालिकाओं को स्वेटर , फ़ीस व्यवस्था आदि के करीब बीस लाख के काज स्वयं द्वारा तथा जनसहयोग से पूर्ण कराया.
महावीर इंटरनेशनल पिंकसिटी की उपसचिव एवं प्रभारी औषध बैंक , कमला जी रेड क्रॉस सोसाइटी , जैन महिला गृह उद्योग , जैन वैश्य संगठन , जयपुर कैंसर सोसायटी , राजस्थान कैंसर सोसायटी  व् कई संस्थाओं की स्थाई सदस्य भी हैं.
1994 में राष्ट्रपति पुरस्कार तथा उसके पिछले वर्ष राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित कमला जी को विशन सिंह शेखावत पुरस्कार, रेड क्रॉस सोसायटी द्वारा स्वर्ण पदक , एड्स रोग संसथान , अल्प बचत विभाग , कुष्ठ रोग संसथान , लायंस क्लब , श्वेताम्बर महिला संगठन आदि आदि द्वारा कई कई बार सम्मानित हुईं .
95 ऍफ़ एम् तड़का “वीमेन रिकग्निशन अवार्ड 2015 में सुश्री कमला पानगड़िया जी “हार्ट ऑफ़ गोल्ड” से नवाजी जा चुकी हैं .
सर्वश्रेष्ठ परीक्षा परिणाम देने वाले विद्यालय की भूतपूर्व प्राचार्य, आदर्श अध्यापिका ,जरूरतमंद व् मरीजों के लिए दया ममता की प्रतिमूर्ति तथा हम सबके लिए प्रेरणास्रोत आदरणीय कमला पानगड़िया जी का मैं करबद्ध अभिनन्दन करती हूँ . आज , राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान आपको कर्मश्री सम्मान से सम्मानित कर स्वयं गौरवान्वित महसूस कर रहा है .
सौ बात की एक बात कि
“ अगर चराग भी आँधियों से डर गए होते ,
सोचिये कि उजाले किधर गए होते !”
राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान की शुक्रगुजार हूँ मुझे सुश्री कमला जी का परिचय पत्र पढने का सुनहरा मौका देने के लिए . 
शुभ दिन !




Monday, April 23, 2018

Meeting eminent author Kashinath Singh ji

एक अप्रैल को सियालदाह पकड़ी थी तो चार की रात मरूधर से वापस पहुँच गई अपने शहर, मग़र इन साढ़े तीन दिनों में जो यात्रा अनुभव हुए वो अपने आप में अनूठा है। भारत बंद की वजह से यह अनुभव कई गुना eventful हो गया। 
एशिया का सबसे बड़ा गाँव, एशिया का सबसे बड़ा, 9किमी, रेलवे यार्ड, एशिया का सबसे बड़ा रिहायशी विश्वविद्यालय, एशिया का सबसे बड़ा विश्विद्यालयी संग्रहालय... सब घूमी!
गंगा स्नान, अस्सी के घाट की महा आरती देखना, फौजियों के गाँव के कामख्या मंदिर में देवी को चढ़े नवरात्रि की चुन्नी का मुझे ओढाया जाना... अलौकिक अनुभव!
मग़र आज जो मैं ख़ुशी आपसे बाँटने जा रही हूँ वह मेरे लिए इन सबसे बढ़ कर है!
काशी में उतर कर अस्सी के घाट पहुँचने तक मुझे "काशी का अस्सी" के लेखक जो याद आए तो उनसे मिलने की उत्कंठा लिए पहुँच गई बी एच यू के मुख्य दरवाजे पर (शायद सिंह द्वार)!
चौकी के पुलिस ने कहा गार्ड से पूछो... गेट के पुलिस ने कहा वो नहीं गार्ड अंदर है... गार्ड ने कंट्रोल रूम के नंबर दिए... कंट्रोल रूम ने पी. आर. ओ. के, पी आर ओ ने हिंदी डिपार्टमेंट के... फ़िर फ़िर से सारे कॉल... आख़िरकार माननीय लेखक के फोन नंबर तथा पता मिल ही गया !
उन्हें फोन किया तो उन्हें मेरे द्वारा पूछताछ की ख़बर लग गई थी, दे दिया समय तीन बजे आने का! 😀
हाँ, मैं "उपसंहार" और "काशी का अस्सी" पढ़ी हूँ! उन अंतराष्ट्रीय ख्यातनाम लेखक सपत्नी के चरण रज ले पाना मेरा सौभाग्य है।
मैं तो क्या बोलती, उन्होंने ही बहुत कुछ पूछा, बताया, समझाया और मरगदर्शन किया।
"कहानी कथाओं में मुझे बेहद रुचि है, मैं तुम्हारी किताब पढूंगा!" कह कर उन्होंने मेरी पुस्तक "तिनके उम्मीदों के" को उलट पुलट कर पूरा देखा और मुझे उसमें कुछ लिखने को dictate किया.
"फोन नंबर जरा बड़े बड़े लिखना!"
उन्होंने "रेहन पर रघ्घू" भी पढ़ने को कहा।
"क्या क्या देखा बनारस में? बी एच यू नहीं घूमी? यहाँ से सीधे वहीं जाना... एक ऑटो करो और पूरे परिसर में चक्कर लगाना। भीतर ही विश्वनाथ मन्दिर भी देखना... और भारत कला भवन भी।"
आधे घंटे की वह मुलाकात तथा प्रेमपगी आवभगत अविस्मरणीय है!
" हे विश्वनाथ ! मुझे फ़िर बुलाना काशी!"
- मुखर

Tuesday, March 27, 2018

सुनहरी दोपहरी

हालाँकि जम्मू और हिमाचल में बर्फबारी हुई है और सुबह की ठंडक बाकी है परन्तु मरुस्थल में आते सूरज की किरणें जेठ सी चमकीली हो गई है! अभी दिन के बारह भी नहीं बजे हैं और फिजां में दोपहर की गंभीरता पसर गई है।
पॉश इलाके की इस कॉलोनी में ऊँचे बड़े बंगले खड़े खड़े ऊँघ रहे हैं और साफ़ सुथरी सड़कें अलसा रही हैं। अनगिनत लोगों की यह बस्ती है मग़र दिखता कोई नहीं। निर्जन सी दोपहर की नीरवता और मंद मंद पवन मुझे बालकनी की तन्हाई में खींच लाते हैं। छोटे बड़े सभी वृक्ष ज्यों थोड़ी थोड़ी देर में उनींदी करवट लेते हिलते हैं... सड़क की दोनों ओर पंक्ति बद्ध अशोक पर नए जवान पानीदार पत्ते बूढ़े पत्तों को हाशिये पर धकेल नव वर्ष के आगमन पर नई छटा अब तक बिखेर रहे हैं। ये सीटी ! किसने मारी? अहा! बिजली के ऊँचे तार पर अंगूठे भर की एक नीली चमकीली नन्ही चिड़िया! इसकी चोंच भी सुई सी पूंछ भी! दो पीली तितलियाँ पल भर में कहीं से आ कहीं को छू! मेरी नजर नचा गईं, मुस्कान दे गईं... बता गईं कि बसंत अभी बस गया ही है...
नजदीक ही कहीं से हैमर ड्रिल की तीखी आवाज और ठक ठक... ह्म्म! शहर के बसावट की जड़ें इतिहास में कहीं दबी पड़ी है और निर्माण अभी जारी है। फिर भी... इस मौसम में कमठे की आवाज भली लगती है, जाने क्यों!  ओह्ह फ़ोन!
"जी भैया!"
"रात की बस है, दस बजे! टिकिट ले लूँ?"
"जी भैया! जी।"
मरुस्थल में आठ नहीं दो ही ऋतुएँ होती हैं भयंकर गर्मी और गर्मी! बाकी सब दो दो दिनों की मेहमान की तरह आती हैं... उन तितलियों की तरह... उनकी झलक पाने को ऎसे ही कुछ पल चुराने होते हैं... अकेले...
- मुखर 24/3/18

अन्तरजाल - एक चाकर

"मैडम, एक बात बताओ, ये नेट पर जो दिखाते हैं वो क्या सब सच होता है?" - बर्तन धोती रुक बाई जी ने पूछा।
मैंने खौलते पानी में अदरक डालते हुए पूछा, "क्यों? क्या देख लिया ऎसा?"
"पाँच छह बरस के बच्चे को एक माँ बुरी तरफ पीटती देखी हमने, जी दोहरा हो गया।"
वह जानती थी गई अब कम से कम दस मिनट की। 😬
" बाई जी! ये दुनिया इतनी बड़ी है कि सब जगह सब प्रकार की चीजें होती रहती हैं। पहले गाँव में भी हम औरतें कहाँ सबको जानतीं थीं। चारदीवारी, पड़ोसी, पनघट, जंगल पानी की चार सहेलियाँ, बस।" मैंने चाय छान कर एक कप उसे पकड़ा दिया।
"गाँव में प्रसव से एक मौत की ख़बर आती है तो कितना बुरा लगता है!
राजस्थान में 45000 गाँव हैं। रोजाना की दो चार मौत की ख़बर मिले तो या तो दहशत बैठ जाए या संवेदनहीन हो जाएं!
कोई माँ अपने बच्चे को यूँ ही तो नहीं मारेगी ना... कितना frustration होगा,आख़िर किसपे ज़ोर चले उसका?
हो सकता है सच ही हो! और राजनीति से संबंधित, जात पांत से संबंधित बातें लगभग झूठी खबरें ही होती हैं।" मेरे हाथ से खाली कप ले वह फ़िर बर्तन धोने लगी।
" नेट पर... इस दुनिया में इतना रोना धोना/ ग़लत बातें हैं कि जन्मों देखते रहो, रोते रहो।
आप तो नेट पर अच्छी अच्छी बातें ही ढूंढा देखा करो।"
ये नेट काँच का वो तिलिस्मी पात्र है कि जैसा मन में भाव हो वैसी ही चीज/बात हाथ लगेगी !
- मुखर
नोट - राजस्थान में 44794 (2011) गाँव हैं यह बात भी गूगल ही ने बताया!

Wednesday, August 30, 2017

एक गज़ल :


आज जी भर क्यूँ न इस तौर से रोया जाए,
अपना दामन खून-ए-कातिल से भिगोया जाए।
.
शहर के सूखते दरिया नज़रअंदाज़ कीजे, ...

आग जब तक न लगे, चैन से सोया जाए।
.
अपने हाथों में जो है वक़्त का एक बीज उसे,
कौन काटेगा फ़सल भूल कर बोया जाए।
.
ये तो मुमकिन ही नहीं आप मसीहा हो मग़र,
मेरे काँधे पे सलीब आपका ढोया जाए।
.
क्या हुआ जो हकीकत में है तामील कठिन,
कम से कम ख्वाब तो आँखो में संजोया जाए ।





Thursday, July 6, 2017

" कशमकश " लघु कथा ( शब्द निष्ठा 2017 में सम्मानित )




"तुम ! मगर तुम तो इन सबको अन्धविश्वास मानती हो ?"
"विपत्ति सारे सिद्धांत खा जाती ..."
"घबराओ नहीं, मेरे रहते कोई विपत्ति तुम्हें छू भी नहीं सकती ! हाँ, बताओ तुम्हारी डेट ऑफ़ बर्थ, अभी देख लेते हैं जन्म कुंडली । "
"परन्तु मेरी विपत्ति मेरी जन्म कुंडली से नहीं, मेरी इस कहानी से पता लगेगी !"
"हहाहाहा ! तुमसे यही आशा कर सकता था ...कवितायेँ, लेख, कहानी !"
" तो शुरू करूँ ?"
" इरशाद !"
" मेरी कहानी का नायक एक बछड़ा है।  जब से हम इस फ्लैट में आये हैं।  सामने के दो अपार्टमेंट के बीच -. फिट की एक संकरी गली सी है जो पीछे से बंद है। गली जो ऊपर बने बालकोनियों से कुछ और संकरी हो जाने के कारण अँधेरी भी है, में एक आध खुले गटर भी हैं...
---
"सुनो, कितनी अजीब बात है , ये बछड़ा जाने क्यों इस गली में घुस कर खड़ा रहता है। "
" हाँ, मैंने भी देखा है। अल सुबह जाता है। शायद 'कोजी' लगता हो, या फिर सिक्योर फील करता हो "
"या फिर हो सकता हो सुबह सुबह इसे खुद पेट भर आने के लिए घर से निकाल दिया जाता हो तो यहाँ इसे 'होमली' लगता हो !"
" हो सकता है। "
" अगर ये बोल सकता तो मैं इससे पूछती जरूर !"
...
" अरे सुनो, नीचे जा रहे हो ? ये दो रोटी बची हुई है कल की, उस बछड़े को दे देना ! कल रोहन के.ऍफ़.सी.  से खा आया था, सो बच गयी !"
...
"रोज ओवर ईटिंग हो जाती है, दूध पी ही नहीं पाता हूँ। आज ये रोटी रहने दो। कल सुबह उस बछड़े को दे दूंगा। "
...
"मैं जा रहा हूँ, कोई रोटी वोटी हो तो दे दो, वो बछड़ा बड़ी आशा भरी नजरों से देखता है मुझे अब !"
...
" पता है, आज मैंने लंच बनाते हुए दो रोटी ज्यादा बनाईं  घी-गुड़ डाल कर अपने हाथों से उसे खिलाया मैंने ! बड़ी प्यारी आँखें हैं उसकी। "
...
" सुनो आज कल वो बछड़ा उस अँधेरी गली में ज्यादा नहीं टिकता  क्या बात है ? "
" वो बिलाल है , वो भगा देता है उसे !"
"ओह्ह !"
" मगर अपने ऑफिस जाने के टाइम तक वो बछड़ा जरूर बैठा रहता है यहाँ वहां !"
" लगाव हो गया है उसे हमसे !"
" अरे वो तो तुम्हारा इन्तजार करता है, कब आओगी, घी गुड़ वाली रोटी अपने हाथों से खिलाओगी ! कोई पिछले जन्म का नाता है क्या ? "
" पिछले जन्म का क्यों, इसी जन्म में नाता जोड़ रही हूँ मैं तो ! कोई ऑब्जेक्शन ?"
" ना ना, मैं काहे बीच में पड़ने लगा !...हहाहाहा ... "
...
"अरे यार !"
"क्या हुआ ?"
" देखो , इस लेख में क्या लिखा है ? काले कुत्ते को या मछलियों को खाना खिलाने से ये पालतू जानवर हमारे उपर आने वाली बला खुद पर ले लेते हैं ! "
" अच्छा ? मगर अपने पास तो कोई पालतू जानवर नहीं है ! "
" ह्म्म्म..."
...
" अच्छा सुनो, आज ऑफिस से जरा जल्दी आना। शाम को शर्मा जी के पास चलना है ! "
"ठीक है "
.....
"अच्छा तो ये है कहानी ! मगर इसमें तो कहीं कोई विपत्ति नहीं दिख रही मुझे। तुम लोगों पर अगर कोई विपत्ति आती होगी तो वो मुझे तुम लोगों के जन्म कुंडली ही देख कर जानना होगा भई ! "
" पंडित जी, बात वो नहीं है। "
" फिर ?"
" मैं कशमकश में हूँ उस बछड़े को रोटी खिलाना बंद मैं कर नहीं सकती । और खिलाते हुए डर लगने लगा है ।  
मैं अपने हिस्से की विपत्तियाँ उस निरीह जानवर पर कैसे डाल दूं ? अब आप ही कोई उपाय बताएं पंडित जी ! किसकी जन्म कुंडली देखेंगे आप ? समस्या ये है कि हमारे उपर आने वाली किसी भी विपत्ति से उस बछड़े को कैसे बचाया जाए ? "
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