Friday, June 22, 2018
“अपशब्द”
Wednesday, June 13, 2018
"समय की नब्ज़ पर हाथ " - पुस्तक समीक्षा
Tuesday, May 29, 2018
हिन्दी का पोस्टर बॉय-
निखिल सचान! नाम तो जानते ही होंगे आप! नहीं जानते? कोई बात नहीं, ये CB से आगे के हैं। CB नहीं पहचाना? अरे! भगत चेतन! तो क्या हुआ जो ये भी आई आई टी, आई आई एम हैं! यूँ ही नहीं इनकी पहली किताब, “नमक स्वादानुसार” और दूसरी किताब “ज़िन्दगी आइस पाइस” क्रमशः 2013 व 2015 की हिन्दी की बेहतरीन पुस्तकों में से एक रही, BBC और आज-तक मीडिया व critics अनुसार.
तो हुआ यूँ कि प्रभा खेतान फ़ाउंडेशन की ओर से प्रायोजित 'कलम दैनिक भास्कर संवाद' में इस इकत्तीस वर्षीय हिन्दी साहित्य के आउट साइडर को सुनने मिलने का मौका मिला।
इनकी ये पहली दो किताबें कहानी संग्रह हैं। ये पहले जो किताब लाना चाहते थे वो “यूपी65” अब आई। वो इसलिए कि इन्हें डर था कि कहीं इनकी पहली किताब पढ़ कर इनके ऊपर CB का ठप्पा लगा कर एक तरफ़ कर दिया जाए। सो वे दोनों किताबें सारे स्टीरियोटाइप को तोड़ने का काम किया है और ये आउट साइडर हिन्दी साहित्य के नए रंगरूटों में सबसे चहेते यानी कि पोस्टर बॉय बन गए!
“यूपी65” बी एच यू में पढ़ने वाले चार दोस्तों की कहानी है। कहानी लिखते हुए इसके पात्र अपने सही नाम से थे, कहानी पूरी होने पर काल्पनिक नाम रखे गए।
कार्यक्रम के मॉडरेटर ख्यातनाम साहित्यकार/आलोचक दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी ने लेखक और उपन्यास से परिचय कराते हुए कहा कि “यू पी 65” में असहिष्णुता की समस्या को बड़े संयम से उठाया गया है। फेमिनिज्म का वर्तमान चेहरा उभरता है। और जिस प्रकार “चंद्रकांता संतती” पढ़ने के लिए लोगों ने हिन्दी सीखी और फ़िर गंभीर सहित्य की ओर मुड़ गए वैसे ही आज जब नई पीढ़ी ने हिन्दी साहित्य से किनारा कर लिया इस उपन्यास का प्रयास है उनके हाथों में हिंदी की किताब आए।
इस उपन्यास से एक पाठक क्या सीखेगा? किसी दर्शन का अभाव है इसमें!
निखिल : करोड़ों अरबों की जनसंख्या है और भावनाएँ वही पाँच सात। कोई रोटी के पीछे, प्रेम, धन, सत्ता, अध्यात्म के पीछे ही तो भागता है। इन भावनाओं से भाग कर नए सिद्धांतों की बात क्यों ढूँढते हैं? हमें बहुत ज्यादा बौध्दिक होने से बचना चाहिए। किताब जहाँ से आई है (बीएचयू कैंपस) के प्रति सच्चा हूँ।
आज की नई पीढ़ी किसी सहित्य अकादमी के विजेताओं के नाम जानती नहीं /याद नहीं।
यह किताब इस ख्वाहिश में है कि ये आपको बे-इंतहा हँसाए, बनारस ले जाए और आपके ज़िन्दगी के सबसे सुकून भरे पलों से मिलवाए।
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हम पर तो ये बरस भोले बाबा का विशेष आशीर्वाद है!
- मुखर
Friday, May 18, 2018
"दवाई वाली मैडम" - एक परिचय
Monday, April 23, 2018
Meeting eminent author Kashinath Singh ji
एशिया का सबसे बड़ा गाँव, एशिया का सबसे बड़ा, 9किमी, रेलवे यार्ड, एशिया का सबसे बड़ा रिहायशी विश्वविद्यालय, एशिया का सबसे बड़ा विश्विद्यालयी संग्रहालय... सब घूमी!
गंगा स्नान, अस्सी के घाट की महा आरती देखना, फौजियों के गाँव के कामख्या मंदिर में देवी को चढ़े नवरात्रि की चुन्नी का मुझे ओढाया जाना... अलौकिक अनुभव!
मग़र आज जो मैं ख़ुशी आपसे बाँटने जा रही हूँ वह मेरे लिए इन सबसे बढ़ कर है!
काशी में उतर कर अस्सी के घाट पहुँचने तक मुझे "काशी का अस्सी" के लेखक जो याद आए तो उनसे मिलने की उत्कंठा लिए पहुँच गई बी एच यू के मुख्य दरवाजे पर (शायद सिंह द्वार)!
चौकी के पुलिस ने कहा गार्ड से पूछो... गेट के पुलिस ने कहा वो नहीं गार्ड अंदर है... गार्ड ने कंट्रोल रूम के नंबर दिए... कंट्रोल रूम ने पी. आर. ओ. के, पी आर ओ ने हिंदी डिपार्टमेंट के... फ़िर फ़िर से सारे कॉल... आख़िरकार माननीय लेखक के फोन नंबर तथा पता मिल ही गया !
उन्हें फोन किया तो उन्हें मेरे द्वारा पूछताछ की ख़बर लग गई थी, दे दिया समय तीन बजे आने का!
हाँ, मैं "उपसंहार" और "काशी का अस्सी" पढ़ी हूँ! उन अंतराष्ट्रीय ख्यातनाम लेखक सपत्नी के चरण रज ले पाना मेरा सौभाग्य है।
मैं तो क्या बोलती, उन्होंने ही बहुत कुछ पूछा, बताया, समझाया और मरगदर्शन किया।
"कहानी कथाओं में मुझे बेहद रुचि है, मैं तुम्हारी किताब पढूंगा!" कह कर उन्होंने मेरी पुस्तक "तिनके उम्मीदों के" को उलट पुलट कर पूरा देखा और मुझे उसमें कुछ लिखने को dictate किया.
"फोन नंबर जरा बड़े बड़े लिखना!"
उन्होंने "रेहन पर रघ्घू" भी पढ़ने को कहा।
"क्या क्या देखा बनारस में? बी एच यू नहीं घूमी? यहाँ से सीधे वहीं जाना... एक ऑटो करो और पूरे परिसर में चक्कर लगाना। भीतर ही विश्वनाथ मन्दिर भी देखना... और भारत कला भवन भी।"
आधे घंटे की वह मुलाकात तथा प्रेमपगी आवभगत अविस्मरणीय है!
" हे विश्वनाथ ! मुझे फ़िर बुलाना काशी!"
- मुखर
Tuesday, March 27, 2018
सुनहरी दोपहरी
हालाँकि जम्मू और हिमाचल में बर्फबारी हुई है और सुबह की ठंडक बाकी है परन्तु मरुस्थल में आते सूरज की किरणें जेठ सी चमकीली हो गई है! अभी दिन के बारह भी नहीं बजे हैं और फिजां में दोपहर की गंभीरता पसर गई है।
पॉश इलाके की इस कॉलोनी में ऊँचे बड़े बंगले खड़े खड़े ऊँघ रहे हैं और साफ़ सुथरी सड़कें अलसा रही हैं। अनगिनत लोगों की यह बस्ती है मग़र दिखता कोई नहीं। निर्जन सी दोपहर की नीरवता और मंद मंद पवन मुझे बालकनी की तन्हाई में खींच लाते हैं। छोटे बड़े सभी वृक्ष ज्यों थोड़ी थोड़ी देर में उनींदी करवट लेते हिलते हैं... सड़क की दोनों ओर पंक्ति बद्ध अशोक पर नए जवान पानीदार पत्ते बूढ़े पत्तों को हाशिये पर धकेल नव वर्ष के आगमन पर नई छटा अब तक बिखेर रहे हैं। ये सीटी ! किसने मारी? अहा! बिजली के ऊँचे तार पर अंगूठे भर की एक नीली चमकीली नन्ही चिड़िया! इसकी चोंच भी सुई सी पूंछ भी! दो पीली तितलियाँ पल भर में कहीं से आ कहीं को छू! मेरी नजर नचा गईं, मुस्कान दे गईं... बता गईं कि बसंत अभी बस गया ही है...
नजदीक ही कहीं से हैमर ड्रिल की तीखी आवाज और ठक ठक... ह्म्म! शहर के बसावट की जड़ें इतिहास में कहीं दबी पड़ी है और निर्माण अभी जारी है। फिर भी... इस मौसम में कमठे की आवाज भली लगती है, जाने क्यों! ओह्ह फ़ोन!
"जी भैया!"
"रात की बस है, दस बजे! टिकिट ले लूँ?"
"जी भैया! जी।"
मरुस्थल में आठ नहीं दो ही ऋतुएँ होती हैं भयंकर गर्मी और गर्मी! बाकी सब दो दो दिनों की मेहमान की तरह आती हैं... उन तितलियों की तरह... उनकी झलक पाने को ऎसे ही कुछ पल चुराने होते हैं... अकेले...
- मुखर 24/3/18
अन्तरजाल - एक चाकर
"मैडम, एक बात बताओ, ये नेट पर जो दिखाते हैं वो क्या सब सच होता है?" - बर्तन धोती रुक बाई जी ने पूछा।
मैंने खौलते पानी में अदरक डालते हुए पूछा, "क्यों? क्या देख लिया ऎसा?"
"पाँच छह बरस के बच्चे को एक माँ बुरी तरफ पीटती देखी हमने, जी दोहरा हो गया।"
वह जानती थी गई अब कम से कम दस मिनट की। 😬
" बाई जी! ये दुनिया इतनी बड़ी है कि सब जगह सब प्रकार की चीजें होती रहती हैं। पहले गाँव में भी हम औरतें कहाँ सबको जानतीं थीं। चारदीवारी, पड़ोसी, पनघट, जंगल पानी की चार सहेलियाँ, बस।" मैंने चाय छान कर एक कप उसे पकड़ा दिया।
"गाँव में प्रसव से एक मौत की ख़बर आती है तो कितना बुरा लगता है!
राजस्थान में 45000 गाँव हैं। रोजाना की दो चार मौत की ख़बर मिले तो या तो दहशत बैठ जाए या संवेदनहीन हो जाएं!
कोई माँ अपने बच्चे को यूँ ही तो नहीं मारेगी ना... कितना frustration होगा,आख़िर किसपे ज़ोर चले उसका?
हो सकता है सच ही हो! और राजनीति से संबंधित, जात पांत से संबंधित बातें लगभग झूठी खबरें ही होती हैं।" मेरे हाथ से खाली कप ले वह फ़िर बर्तन धोने लगी।
" नेट पर... इस दुनिया में इतना रोना धोना/ ग़लत बातें हैं कि जन्मों देखते रहो, रोते रहो।
आप तो नेट पर अच्छी अच्छी बातें ही ढूंढा देखा करो।"
ये नेट काँच का वो तिलिस्मी पात्र है कि जैसा मन में भाव हो वैसी ही चीज/बात हाथ लगेगी !
- मुखर
नोट - राजस्थान में 44794 (2011) गाँव हैं यह बात भी गूगल ही ने बताया!



