Monday, December 17, 2012


 पहली कुल्हाड़ी !
*************
वो इन चौराहों पर अरसे से
अपने बटुए करती आई है खाली
मगर ये फैलते हाथ
रक्तबीज से बढ़ते ही जाते हैं !

एक अजीब सी घुटन ने  
कार का शीशा चढ़ा लिया.
आज उसे मखमली बिस्तर पर
हमेशा की सहेली नींद नहीं मिली,
जो इस भाव में अकसर साथ रहती थी
कि आज फिर एक मुंह को निवाला मिला.
उसके  दर्द ने आँखों की राह ली
और कागज पर ढुलक गए.
लोग कहते है -
तुम कवितायेँ अच्छा लिखती हो !
सुन कर जाने उसने क्या तो गटक लिया.
 जाने क्या था जो हलक में अटक गया.

लाल बत्ती पर
भूख और मौत रचते हैं व्यूह !
दौड़ती भागती गाड़ियों में
पल भर को पसीजते दिल.
और वो पसरते हाथ
जिंदगी और मौत से गाफिल !

ये जो चार पैसे देती हो तुम
गरीबी की जड़ सींचती हो तुम !
जिस दिन वो बच्चा
हाथ फ़ैलाने में हिचकिचाएगा,
मांग के खाने में शर्मायेगा,
उस दिन गरीबी पर पड़ेगी
पहली  कुल्हाड़ी !

गरीबी दम तोडती है -
आत्म सम्मान कि चौखट पर !
आँखों में स्व- सम्मान ही न हुआ
तो किसीका भी सम्मान  कैसा ?
सम्मान नहीं तो प्यार कैसा ?
एक कुचक्र को जन्म देती
हमारे  कोमल भावुक कृत !
उन्हें पैसा नहीं, प्यार देना है .
प्यार से पहले सम्मान देना है .
सम्मान से पहले आत्म - सम्मान !
                             - मुखर .
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Wednesday, November 28, 2012

'कार्तिक का चाँद '
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कल शब् / अपनी मेज पर बैठा मैं
ख्वाबों की कलम ले
शब्दों की स्याही से
मन के कागज पर
कोई कविता उकेर रहा था
कि लगा, खिड़की से
तुम ताक रही हो !
और मेरे शब्द चांदनी,
स्याही उजली हो गयी !
कविता भाव विभोर सी हो
मन ही मन, मेरे मन में
मचलने लगी !
मुखड़ा तुम्हारा था ,
और मैं मात्राओं की तर्ज पर
प्रेम बांध रहा था.
घुमते, झूमते, मुड़ते, रुकते...
मैं डूब रहा था,
तुम घुल रही थी
पंक्ति दर पंक्ति
कविता पूरी हो रही थी !

हवा के झोंके ने
तोड़ी तन्द्रा
डायरी का पन्ना-
फडफड़ा रहा था ,
हर शाम की तरह वह
आज भी कोरा पड़ा था !
क्योंकि मेरे शब्द-चांदनी,
स्याही- उजली हो गयी थी !

नहीं नहीं, मैं कोई
कविता नहीं कर रहा था .
मैं तो -
तुम्हे सोच रहा था !
नहीं , खिड़की पर
तुम नहीं ताकती थी,
कार्तिक का चाँद चढ़ रहा था !
                          - मुखर.

Thursday, October 25, 2012

'चार दिनों दा प्यार... '
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नहा धो  कर  धूप  में  बैठी  थी  नेल्स  फाइल  करने कि उस पर नज़र पड़ी. वह फिर आ बैठा था, वहां, उपर ! सब कुछ छोड़ छाड़ मैं भाग कर बाहर आ गयी बगीचे में. कनखियों से देखना चाहती थी कि वो अब भी लंगड़ाता है क्या. अगर हाँ, तो वो मेरा ही है ! धत्त ! कितनी मतलबी है तू भी ! बस चार ही दिन का तो साथ था तेरा उसका . इतने में देखा वो उड़ गया. अचानक उदासी घिर आई और लगा कि नहीं, वो नहीं था शायद ये !
'आंटी, क्या देख रही हो ?"
'वो जो तूने कमेड़ी दिया था न, उसी को ढूँढती हूँ. मगर लगता है वो मुझे भूल गया .
'आपको क्या पता वो 'था' ? कमेड़ी है तो 'थी' भी तो हो सकती है. हैं ? "
'चल जा ! स्कूल नहीं जाना तुझे ? तू नहीं समझेगी !'
मन में जानती थी, उस कमेड़ी से एक टाइप का अटैचमेंट हो गया था. उसे ओपोजिट जेंडर का मानना अच्छा लगता है. रोमांटिक कनेक्शन फील होता है. ;)
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करीब महिना भर पहले की बात है. ख़ुशी और नेहल ने आवाज लगायी - 'आंटी ! बाहर आओ, एक चीज देनी है '
'नहीं, मैं अपने गुलाब नहीं दूंगी '
'अरे, गुलाब लेने नहीं, आपको कुछ देने आये हैं '
बाहर गयी तो देखा गत्ते का बॉक्स है उनके हाथ में.
'क्या है ' - मैंने पुछा.
'पहले बोलो आप मना नहीं करोगी. प्लीज़ प्रोमिस करो आप रख लोगे. ' - ख़ुशी बोली.
'हाँ आंटी ! हम दोनों की मम्मी ने रखने से मना कर दिया. कहती हैं कबूतर घर में नहीं रखते . कहती हैं..
'कबूतर ! दिखाओ ! कहाँ मिला ? अरे, इसके तो पंख टूटे हुए हैं !...
'हां आंटी, हम नहीं पहुँचते तो ले ही जाती बिल्ली इसको !'
'चलो ठीक है, रख दो इसको छत की सीढ़ियों पर .'
ढाई -तीन घंटों तक उन लड़कियों कि चीं चीं चूँ चूं  से परेशान हो आखिर धमकी देनी पड़ी कि ले जाओ इसको अपने घर.
वो उसे छोड़ कर चुप चाप चली गयी.. थोड़ी देर में उस कमेड़ी को मैं संभाल आई.
थोड़ी देर बाद फिर देखने गयी तो एक कटोरी में थोड़े चावल- गेंहू रख आई.
थोड़ी देर में ध्यान आया पानी भी रख आऊं.
'उन लड़कियों को डांट रही थी, अब तुमने खुद उस पक्षी को परेशान कर रखा है ' - इन्होने ताना मारा.
'अच्छा जी ? परेशान कर रही हूँ ? तुम्हे क्या पता 'केयर' किसे कहते है ? ' - नहले पे देहला मैंने भी मारा .
'हाँ - हाँ, वो तो देख ही रहा हूँ ' - तीर निशाने पे लगा था.
' हे, डोंट बी जेलस , देखो मैंने थोड़े न्यूजपेपर रख कर थोड़े अशोक के पत्ते डाल कर इसके लिए 'फील एट होम' का कम्फर्ट दिया .मगर देखो न फडफडाना तो दूर ये हिल डुल भी नहीं रहा.बस गर्दन हिला हिला कर टुकुर टुकुर देख रहा है. बहुत दर्द होगा न इसे ? थोड़ी सी डिस्प्रिन का टुकड़ा घोल कर दे दूं इसे ?'
'तुम भी हद करती हो. इनकी और अपनी एनाटोमी में डिफ़रेंस होता है. डिस्प्रिन से हार्म हो सकता है. '
हूँ !...
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' सुनो ! वो वहां नहीं है ! पता नहीं कहाँ गया. मैंने सब जगह ढून्ढ लिया . तुम भी न कैसी बातें करते हो ! दरवाजे खिडकियों की तो जाली बंद रहती है न !.
नहीं, किट्टू के स्कूल जाते ही बंद कर दिया था मैंने. ...
'दीदी !...
'क्या है बाई जी ?..
'ये टी. वि...
'हाँ, उसके पीछे भी सफाई कर दिया करो कभी...
'अरे, देखो तो आप ...
'वाह ! मिल गया !
मैंने उसके बॉक्स को चौकी पर जाली के पास धूप में रख दिया, और दरवाजे के उस पार चिड़ियों को दाने डाल दिए. अकेला महसूस नहीं करेगा और उड़ने की भी कोशिश करे. इन्होने कितना कहा की बाहर रख देता हूँ, उड़ जाने दो. तुमने उसको कैदी बना लिया है.
'हाँ, घर में तो फडफडा तक नहीं रहा, बाहर बिल्ली या ननकू खा जाएँगी. पता है आज सुबह मैंने डेटोल में डूबा फाहे से इसके पंख और पांव साफ़ कर इसके पांव में हल्दी का लेप लगा दिया था .'
ये काम पर निकल गए थे.
फिर तो दिन भर कभी पेलमेट पर, कभी बिस्तर, मेज पर तो कभी मेरे कंधे पर और कभी मेरी गोद में...ठीक होने लगा था. मुझे लगा मेरे पर निकल रहे हैं.
शाम को ये आये तो मैंने कहा - 'देखो, कैसे घूर घूर कर देखता है...टमक टमक ...!'
'देखता है ? कि देखती है ?'
'अरे, तुम्हे नहीं मालूम. हम फीमेल्स को देखने देखने का अंतर पता चलता है !'
'और तुम जो उस बेचारे को सुबह से छेड़ी जा रही हो ? कभी अचानक से ताली बजा कर चमका देती हो, कभी सहलाती हो..'
'चलो हटो ...
---
अगली सुबह मैंने उसे जैसे ही बाहर धूप में रखा वो डैने फैला कर उपर तार पर जा बैठा. बहुत खुश हुई मैं. देखो, देखो, वो ठीक हो गया, वो उड़ गया ! और थोड़ी ही देर में वो बाउंड्री वाल पर आ गिरा, शायद संभाल नहीं पाया. ननकू उस पर झपटती उसके पहले उसे मैं उठा लायी. वो भी आराम से मेरी पकड़ में बैठा रहा. उसका वापस आना मुझे ज्यादा अच्छा लगा या मेरा दिल इसलिए खुश था कि उसे मैंने ननकू के ग्रास बनाने से बचा लिया ? पता नहीं !
कुछ भी हो, हम दोनों में एक खुबसूरत रिश्ता कायम हो गया था. उसका मुझसे भरोसे का, और मेरा उससे लगाव का !
मगर पांचवे दिन सुबह सुबह वह ऐसा उड़ा कि फिर दिखाई ही नहीं दिया.
'देखो न ! वो चला गया ! निर्दयी कहीं का ! तुम मुस्कुरा रहे हो ?'
'खुश हूँ कि तुम्हे मेरी सुध तो आई !'...
-------------------------------- मुखर

Tuesday, October 9, 2012

- क्या तुम जिन्दा हो -
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मैं कुछ सोचती नहीं
बोलती तो बिलकुल भी नहीं

जो वैज्ञानिक प्रयोगशाला में न कर सके,
आदमी घर बैठे कर गया
रोबोट से बेहतर मशीन
मुझे ठोक ठोक कर बना दिया.
टी वी, नेट, पेपर पढ़ते पढ़ते
बस जबान हिलाइए
और आपका नाश्ता टेबल पर
आपका बिजनेस सूट प्रेस
जूता पालिस
लेपटोप, डायरी,पेन, टाई
कर की चाबी समेत सब रेडी .
और तो और - आप अपनी
खीज भी निकाल सकते हैं ,
मुझे डांट मार भी सकते हैं !
मैं कुछ सोचती नहीं न,
बोलती तो बिलकुल भी नहीं !

आप कमा नहीं सकते तो क्या
दहेज़ के नाम पर
मेरे बाप से मांग सकते हैं !
बाप गर न नुकुर करे
आप मुझे घर से निकाल सकते हैं !
वैसे भी साल में पांच त्यौहार
इसीलिए तो आते हैं,
जब लड़की के घर वाले
आपके घर 'माल' पहुंचाते हैं !!

मुझे याद आया सदियों से
मुझे कही जाने वाली बात
दिमाग इस्तेमाल करना बंद करो !
बहुत चलती है तुम्हारी जुबान!
जाओ अंदर! बच्चे संभालो, रोटी सको !
लुहार सी सौ सौ चोटों ने
हजारों वर्षों में -जड़ दिया ताला !
और मैं मर गयी !
वैसे बिलकुल मर भी नहीं गयी-
बस बोलती व् सोचती नहीं !

और जब मैं बोलती भी हूँ,
थोडा सोचती भी हूँ,
तो क्या वाकई 'मैं' ही बोलती हूँ ?
या मेरे अंदर भरी हुई
'हमारी ' ही परम्पराएँ
'हमारी ' ही जरूरतें
'हमारी ' ही भाषाएँ -
शब्द रूप लेती हैं ?

कल पढ़ा था मैंने
मरने के बाद
आदमी बोलता नहीं.
मरने के बाद-
आदमी सोचता नहीं.
यकायक नजर आने लगी
मुझे चलती फिरती लाशें !
कहो दोस्त - क्या तुम जिन्दा हो ?

2.
हे - हेलो - हाँ तुम
तुम भी बहन - बेटी के घर
तीज त्यौहार नजराना पहुंचाते हो न ?
बहु, बीवी के घर से आया माल
परंपरा के नाम पर उड़ाते हो न ?
भावी घर वाले आगे पढाये,
पढना, नौकरी कराएँ तो करना
ऐसा कह कर अपनी बेटी को बहलाते हो न ?
( उस throughout goldmedalist ने RAS परीक्षाएं सिर्फ इसलिए
नहीं दी कि शादी तो राजस्थान से बहार ही होगी न ? फिर क्या करुँगी ?)
नौकरी करती हो तो
अपनी ख़ुशी के लिए
तुम्हारे पैसे से घर नहीं चलता
यह अहसास जताते हो न ?
वो तुम्हारे उम्र के लिए रखे उपवास
तुम गुटखे, मय या धुएं में
खुद का भी - उसका भी -
दिल - दिमाग - शरीर गलाते हो न ?

तुम कब सोचोगे ?
तुम कब बोलोगे?
सड़ी गली परम्पराएं
तुम कब तोड़ोगे?
कहो दोस्त - क्या तुम जिन्दा हो ?
उस दिन पढ़ा था न मैंने भी तुमने भी -
मरने के बाद...

                   मुखर .


Friday, August 31, 2012

' हिमाकत '
***********
हिमाकत देखी उसकी ?
चुनौती भी दी तो किसको?
घुप काले अंधियारे को?
 है क्या वो? एक जरा सा रुई का फाया ?
उसकी औकात क्या है ?
आधे क्षण में तो भष्म हो जाता है !
फूंक मारो तो उड़ता जाता है  !
ठीक है, तो देख लेंगे !
और शर्त क्या रखी थी उसने ?
बस एक कटोरी तेल और थोडा सा बट ?
ठीक है, आने दो आज रात !
निकालते हैं उसकी ऐंठ !
ख़ैर ! दो कोमल हाथों ने,
जिनमें खूबसूरती थी मन की
और रौशनी की लगन थी,
उस फाहे को बड़े तन्मयता से बटा .
एक दिए में कटोरी भर तेल डाल
उस बाती को टिका रखा !
सूरज के ढलते ही ,
अँधेरे की महफ़िल जमी.
रुई के फाहे के बदले रूप पर
काले  सन्नाटों का ठहाका लगता  रहा..
तभी खनक के आवाज के साथ,
झीने से आँचल में से निकले,
दो नाजुक से कोमल हाथ .
बड़ी दृढ़ता से उस बाती को बाला.
पलक झपकते ही अँधेरा गुल हुआ.
दूर तलक उम्मीद की रौशनी,
इतरा कर झिलमिला उठी !
उस उम्मीद की लौ पकडे ,
कई पतंगे इधर को उमड़ पड़े.
और रात भर उस रुई के फाये की
जीत का जश्न मनता रहा.
उधर घूंघट में कोई मुस्कुरा उठा !
                                     - मुखर.

Monday, August 20, 2012

'साजिश '
इश्क में  हम  चुप ही रहे,
अक्ल से था काम लिया,
नाम तेरा लिख कर रेत पर
लहरों के था नाम किया!

हम चुप थे हाय मगर 
लहरों ही ने घात किया ,
समंदर से कहती थी लहर
सूरज ने जिस पर कान धरा
करता रहा वह मेघों को खबर !
गिरी जो दो बूंद -
इश्क की सौंधी खुशबू से
महक उठ्ठी फिर मिटटी !

मन की मुठ्ठी में जो
रखा अब तक कैद था
वो मुस्क आज चहुँओर था !
मेघ घनघोर घुमड़ घुमड़
समंदरी  साजिश का शोर था
बूंद बूंद फिर धरती के कानो
नाम तेरा रिसता रहा.
बिखेर  रहा  था अम्बर प्रेम मोती
मन मेरा क्यों मयूर था ?

इश्क में हम तो चुप ही थे
अक्ल से था काम लिया ,
रेत पर छुपा कर जो लिखा था
लहरों ने वो चर्चा यों आम किया...
                                       - मुखर.