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Wednesday, November 28, 2012

'कार्तिक का चाँद '
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कल शब् / अपनी मेज पर बैठा मैं
ख्वाबों की कलम ले
शब्दों की स्याही से
मन के कागज पर
कोई कविता उकेर रहा था
कि लगा, खिड़की से
तुम ताक रही हो !
और मेरे शब्द चांदनी,
स्याही उजली हो गयी !
कविता भाव विभोर सी हो
मन ही मन, मेरे मन में
मचलने लगी !
मुखड़ा तुम्हारा था ,
और मैं मात्राओं की तर्ज पर
प्रेम बांध रहा था.
घुमते, झूमते, मुड़ते, रुकते...
मैं डूब रहा था,
तुम घुल रही थी
पंक्ति दर पंक्ति
कविता पूरी हो रही थी !

हवा के झोंके ने
तोड़ी तन्द्रा
डायरी का पन्ना-
फडफड़ा रहा था ,
हर शाम की तरह वह
आज भी कोरा पड़ा था !
क्योंकि मेरे शब्द-चांदनी,
स्याही- उजली हो गयी थी !

नहीं नहीं, मैं कोई
कविता नहीं कर रहा था .
मैं तो -
तुम्हे सोच रहा था !
नहीं , खिड़की पर
तुम नहीं ताकती थी,
कार्तिक का चाँद चढ़ रहा था !
                          - मुखर.
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