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Friday, December 27, 2013

 " बारात जिंदगी की "

मैं मुस्कुराती हूँ-

कि मेरे आंगन से

गुजरती है बारात जिंदगी की !

मैं मौन हूँ -

कि उसी जिंदगी के

तहखाने के रौशनदान से

देखती हूँ मैं -

खुशियों को घूमर डालते !

आनन्द को झूमते !

कहकहों को झिलमिलाते !

सुनती हूँ सपनों कि शहनाईयां !

नहीं जानती कि -

ये बारात क्यों है !

जानती नहीं-

जिंदगी क्या है !

और ये भी नहीं,

ये तहखाना कैसा !

मैं परेशान हूँ कि -

कोई तो दरवाजा हो,

कहानी की शुरुआत तो हो !

देखना है मुझे -

किस तोरण पर

जाती है जिंदगी के बारात !!


                  मुखर .
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