
Friday, June 24, 2016
Friday, April 29, 2016
* फ़ितूर * - कहानी
उसे 'कभी जिंदगी ... ' सीरियल का रामकपूर बहुत पसंद है। वो अक्सर सोचती है , ' इतने अच्छे इंसान की जिंदगी इतनी कष्टकर क्यों
होती है ? जाने अगली कड़ी में उसके साथ क्या होने वाला है ? असल जीवन में भी
तो यही होता है। मेरी खुद की जिंदगी कौन
सी खुशगवार है ?'
राधिका का रोज का
यही नियम हो गया है। रात आठ बजे तक बच्चों
को डिनर करा कर पढ़ने बैठा देती है। और खुद
टी वी ऑन करके बैठ जाती है। अरुण जल्दी आये
या देर से ,वो अपने सारे
सीरियल देख कर ही साढ़े नौ बजे तक उठती है।
तब तक बच्चे या तो शैतानी कर रहे होते हैं या फिर सो चुके होते हैं। अरुण कई बार उसे टोक चुका है , प्यार से समझा चुका है। मगर वो जानती है कि यह सब तो रोज का टंटा
है। आखिर कोई कब तक खटे !
कई बार अरुण ऑफिस
से लौटने के बाद सोते हुए बच्चों को पहले चादर ओढ़ाता है। रोटी सिकी हुई होती तो खुद ही खाना परोस लेता
और रोटी सिकी हुई नहीं होती तो पति पत्नी में जोरदार तू तू मैं मैं हो जाती।
'अरे जब सुबह का
खाना खा कर गए हुए हो तो दो और मिनट में क्या तुम्हारी जान निकल जाती है ? इतना ही है तो नीचे अपनी माँ को क्यों नहीं कह
देते ? क्या जिंदगी है
मेरी भी ! दो घडी टी वी जो देखने बैठ जाती
हूँ बुरा भला सुना देते हो ! दिनभर घर के काम और बच्चों ही से नहीं उभर पाती हूँ
ऊपर से तुम्हारी माँ की भी सुनती हूँ ! प्यार है ना इज़्ज़त है इस घर में !... और
उसका बड़बड़ाना जारी रहता है।
राधिका के जीवन में अगर कुछ थोडा सा बहलावा है
तो ये कोई तीन चार धारावाहिक। कहीं राम
कपूर, कहीं स्मृति
ईरानी तो कहीं बा की कहानी है। हर
केरेक्टर अपने अपने हिस्से के ग़म और दुःख को झेलता हुआ भविष्य के सुख के सपने
संजोय हुए है। ठीक उसी की तरह जैसे किसी
तरह अपने वजूद को कायम किये हुए कि कभी तो सवेरा होगा !
राम कपूर सोचता
है कि जिंदगी की सभी परेशानियों का हल ले कर कोई उसके सपनो की रानी ही आएगी जो
चाहे बेहद खूबसूरत न होगी मगर उसका घर और जीवन संभल जायेगा।
ऐसा ही स्मृति
ईरानी के साथ है। बचपन से हर प्रकार की
कमी में पली बढ़ी। पियक्कड़ बाप , अनपढ़ माँ
और चार बच्चों के लड़ते झगड़ते परिवार से मिले संस्कार। गाँव के रूढ़ि - रीतियों से बेजार। टी वी
में देखे पिक्चरों सा सजा भविष्य
का सपना ! बस शादी हो जाये तो जहन्नुम से छुटकारा मिले !
बा जो की बचपन ही
में ब्याहे जाने की वजह से कभी मुस्कुराने तक का वक़्त नहीं मिला। हमेशा कोल्हू के बैल की तरह चक्की में पिसती
हुई अक्खड़ बुद्धि, अधेड़ उम्र और
कसैली जुबान लिए बस एक बहु का इंतज़ार कर रही है कि अब मैं राज करूंगी !
तीनो सिरिअलों को
देखते हुए राधिका तीनों चरित्रों से भावनात्मक जुड़ाव महसूस करती है और उनकी जिंदगी
में बुरा करने वाले चरित्रों को टी वी ऑफ
करने के बाद तक कोसती रहती है। अपनी खुद
कि जिंदगी को मशीन की तरह जीती, कडवे घूँट की तरह पीती वह इन पात्रों
ही को जीती है। यहीं से उसे थोड़ी बहुत
उर्जा मिलती है।
कि एकबार उसने
देखा वो खुद टी वी के अन्दर है। सीरियल
में दिखाते घर की दीवारें बहुत कुछ अपनी
सी है। कि देखा वह स्मृति ईरानी है और
जिससे उसका ब्याह हुआ है वो और कोई नहीं राम कपूर ही है। और देखो, बा उसकी सास है। मगर तीनों चरित्रों की बढ़ी हुई अपेक्षाएं और खाली खाली मन किसी को कुछ
देने की स्थिति में नहीं है। बस लेना ही जानते हैं और नहीं मिलने पर मांग लेना फिर
छीन लेना जानते हैं। राम कपूर अब अच्छा
नहीं लगता है बिलकुल भी। उसकी शक्ल तक
अरुण जैसी लगने लगी है। उसकी डिमांड्स
बहुत ज्यादा है और दिल का एकदम रूखा। अपनी
जिंदगी से जुड़े हर शख्स के प्रति राधिका की अनगिनत जिम्मेदरियों के खेप ही राम के
दिल से पूरी नहीं होती। और बदले में प्यार
के दो बोल नहीं ... प्रवचन ही बस।
बा अपनी अक्खड़
बुद्धि और कसैली जुबान 'स्मृति ईरानी '
पर खुली छोड़ दी है और राज
करने के सारे पैंतरे आजमाए हुए है। इधर 'स्मृति ईरानी ' यानि राधिका खुद अपने बड़े बड़े सपनों को घिसते, टूटते
बिखरते देख रही है। पुरजोर हाथ
पांव मार रही है उन्हें बटोरने के, फिर से जोड़ने के मगर हाथ में से रेत सा कुछ फिसलता जाता है.
अब उसे ये अपना
सपनो का महल अपने पीहर के जहन्नुम से भी बदतर लगने लगा है। वो कभी उल्टियां कर रही
है कभी बुखार में तड़प रही है और कभी लगता है कि ये तमाम बीमारियाँ उसे है ही नहीं
बस वहम है। उसका दिमाग चक्कर खाने लगता है,
सारा बदन टूट रहा है। तभी
दूर से अरुण की आवाज आती है - ' माँ, उठो तुम घर जाओ.
नीचे रेसेप्श्म पर विपुल है तुम्हे घर छोड़ आएगा। मैं बैठ जाता हूँ राधिका के पास।
आज मैंने छुट्टी ले ली है ऑफिस से।
राधिका अधमुंदी
आँखों से देखती है कि वह अस्पताल के वार्ड में बिस्तर पर है। मांजी साथ में रखी
कुर्सी पर शायद सो रही थी बैठी बैठी। अरुण अब उसी के पास आ कर सिरहाने बैठ जाता है,
उसका माथा सहला रहा है।
पूछने पर बताता है कि परसों शाम ऑफिस से लौटने पर उसने राधिका को १०५ डिग्री बुखार
में पाया। उसी समय विपुल को बुला हस्पताल दौड़े।
मम्मी रात बच्चों के पास थी। सुबह घर का सारा काम निपटा, बच्चों को स्कूल भेज यहाँ आई तो अब तक यहीं
थी। कल बच्चों को मैं विपुल के घर छोड़ आया था भाभी के
पास। रात मम्मी रुकी हस्पताल में, मुझे अलाउड नहीं था ना !
अब कैसा लग रहा
है ?
राधिका
मुस्कुराना चाहती थी ! कमजोरी में शरीर ने साथ नहीं दिया। मगर अब उसे राम कपूर और
बा मिल गए थे। सच्ची में। टी वि से बाहर उसकी अपनी जिंदगी में। वो जानती थी कि इन्हें वो जी जान से चाहती
है। उसे भलीभांति पता है इन्हें जिंदगी से
क्या चाहिए। उसका बदला व्यवहार सभी की
कडवी स्मृतियों को बदल कर मीठा कर देगा।
अब उसकी अपनी जिंदगी मशीनी नहीं
रहेगी। अपने सपनों का महल किसी टी वी सीरियल से बेहतर न बना दे वो स्मृति ईरानी
... ओह्ह सॉरी ... राधिका नहीं !
अरुण ने देखा
उसकी राधिका के होठों पर हंसी खिलने को आतुर थी ...
--- ----*---------*----------*----------
Wednesday, March 30, 2016
* धूलिवंदन *
तेरा मेरा, मेरा तेरा रग रग इक रंग
तन मन रंग रंग
अंग अंग रंग रंग
तेरा रंग मेरा रंग
इक रंग इक रंग
रज रज रंग रंग
रग रग रसरंग
रस रस अंग अंग
अंग अंग रस रंग
तेरा मेरा, मेरा तेरा
रग रग इक रंग!
मैं भी रंगू तू भी रंग,
अंग अंग रम रंग!
संग संग रंग रंग,
तन मन रंग रंग
तेरा मेरा, मेरा तेरा
इक रंग इक रंग।
- - - - - - - - - - - मुखर! 23/3/16
रग रग रसरंग
रस रस अंग अंग
अंग अंग रस रंग
तेरा मेरा, मेरा तेरा
रग रग इक रंग!
मैं भी रंगू तू भी रंग,
अंग अंग रम रंग!
संग संग रंग रंग,
तन मन रंग रंग
तेरा मेरा, मेरा तेरा
इक रंग इक रंग।
- - - - - - - - - - - मुखर! 23/3/16
Wednesday, March 9, 2016
* नकचढ़ी *
आइना निहारती ,
लिपस्टिक लगाती लड़कियां ,
मुझे अच्छी लगती हैं
फैशनपरस्त लड़कियाँ।
सदियों से सुनार की सौ सौ
तो अक्सर लुहार सी मार
खाकर ख़ाक था आत्मसम्मान !
अब लांघती है आत्मसम्मान की
एक साथ कई कई सीढ़ियाँ !
ये फैशनपरस्त लड़कियाँ !
गुरूर से भरी , नकचढ़ी !
कसे 'गर कोई राह चलता फब्तियाँ ,
मौका मिलते ही
चढ़ती हैं सीना,लगाती चपत
समूह में तो ऐसी लगाती लात ,
लफंगों की हिल जाती हैं पीढ़ियां !
डर किसी का नहीं ,
निर्भरता किसी की नहीं ,
भाई से ज्यादा कमाती हैं लड़कियाँ !
मांगती नहीं , छीनती नहीं ,
बल्कि जीती हैं अपना हक़ !
चुनौती की, भेदभाव की ,
हर दिवार ढहाती लड़कियाँ !
ये फैशनपरस्त लड़कियाँ !
आइना निहारती,
लिपस्टिक लगाती लड़कियाँ ,
मुझे अच्छी लगती हैं ,
फैशनपरस्त लड़कियाँ !
-*-*-*-*-* मुखर 6/3/16
महिला दिवस मुबारक़ !
लिपस्टिक लगाती लड़कियां ,
मुझे अच्छी लगती हैं
फैशनपरस्त लड़कियाँ।
सदियों से सुनार की सौ सौ
तो अक्सर लुहार सी मार
खाकर ख़ाक था आत्मसम्मान !
अब लांघती है आत्मसम्मान की
एक साथ कई कई सीढ़ियाँ !
ये फैशनपरस्त लड़कियाँ !
गुरूर से भरी , नकचढ़ी !
कसे 'गर कोई राह चलता फब्तियाँ ,
मौका मिलते ही
चढ़ती हैं सीना,लगाती चपत
समूह में तो ऐसी लगाती लात ,
लफंगों की हिल जाती हैं पीढ़ियां !
डर किसी का नहीं ,
निर्भरता किसी की नहीं ,
भाई से ज्यादा कमाती हैं लड़कियाँ !
मांगती नहीं , छीनती नहीं ,
बल्कि जीती हैं अपना हक़ !
चुनौती की, भेदभाव की ,
हर दिवार ढहाती लड़कियाँ !
ये फैशनपरस्त लड़कियाँ !
आइना निहारती,
लिपस्टिक लगाती लड़कियाँ ,
मुझे अच्छी लगती हैं ,
फैशनपरस्त लड़कियाँ !
-*-*-*-*-* मुखर 6/3/16
महिला दिवस मुबारक़ !
Monday, March 7, 2016
* श्रद्धा *
कम से कम त्यौहार पर तो नया कपड़ा पहन लिया कर। खुद ही को
डपटती मैं नहा कर तैयार हो रही थी। पर्स उठाया ही था कि आईने में से मेरे अंदर की मुखर
ने ताना कसा-
कहाँ चल दी मैडम? वही पितृसत्तात्मक गढ़ को शीश नवाने? जिसने महिलाओं की परतंत्रता के इतने नियम बनाए उसी को फूल चढ़ाने ? कन्या धन पराया धन, पुत्र से ही मोक्ष...
बस बस! वही पुराना राग!
तो तुम ही कुछ नया करो!
हुँह! आईने को मुँह चिढ़ाती मैंने पर्स उठाया और चल दी।
गोविंदम स्वीट्स से बीस समोसे लिए। राशन की दुकान से बीस बीस साबुन, छोटी छोटी शीशियां तेल की और टूथ ब्रश लिए। पास ही बंजारों की बस्ती में बच्चों को बांट दिया! उनकी खुशी और मस्तीयां ज्यादा शुकून दे गई।
कार स्टूरियो पर FM गा रहा है, छुट्टी है मौज मनाओ...
ओए! कहां छुट्टी बच्चू! चल आफिस! smile emoticon
*
आप सभी आज शिव लिंग पर पुष्प दूध अर्पण करते जरा गौर से देखना, वहीँ शक्ति योनी भी विराजमान हैं!
* * * मुखर। 7/3/16
कहाँ चल दी मैडम? वही पितृसत्तात्मक गढ़ को शीश नवाने? जिसने महिलाओं की परतंत्रता के इतने नियम बनाए उसी को फूल चढ़ाने ? कन्या धन पराया धन, पुत्र से ही मोक्ष...
बस बस! वही पुराना राग!
तो तुम ही कुछ नया करो!
हुँह! आईने को मुँह चिढ़ाती मैंने पर्स उठाया और चल दी।
गोविंदम स्वीट्स से बीस समोसे लिए। राशन की दुकान से बीस बीस साबुन, छोटी छोटी शीशियां तेल की और टूथ ब्रश लिए। पास ही बंजारों की बस्ती में बच्चों को बांट दिया! उनकी खुशी और मस्तीयां ज्यादा शुकून दे गई।
कार स्टूरियो पर FM गा रहा है, छुट्टी है मौज मनाओ...
ओए! कहां छुट्टी बच्चू! चल आफिस! smile emoticon
*
आप सभी आज शिव लिंग पर पुष्प दूध अर्पण करते जरा गौर से देखना, वहीँ शक्ति योनी भी विराजमान हैं!
* * * मुखर। 7/3/16
Friday, February 26, 2016
Jaipur Marathon '16 - My personal account.
It was 13th Feb and I was excited.
I called up the landline number provided in the e-page.
‘Ramlila Maidaan, fine. Registration? Never mind , i won't
be running, would just watch the beginning.’ And feel the thrill in the
electrified air by the huge crowd in the background of dawn, I thought.
* * morning alarm * *
My hands, as usually, reached to snooze. But i sprang up!
It's Sunday, i can always have siesta. Within half an hour I, with a 13 yr boy
from neighborhood, was driving towards Albert Hall. Driving more than seven KMs
is a long drive for me :) 'coz i seldom get an opportunity. Of course i had
decked up in running gears complete with track suit and running shoes, and
properly tied plait.
'Aunty, your chest number?', the boy enquired.
As we neared the
spot, the place was already beaming with young crowd in the festivity of
health. Parking was no problem, which i feared most, as it was early morning.
Besides banners and heading crowd, the energetic beats of drums guided us well to
the starting point.
Such a varied crowd! People in different color coded
t-shirts representing their affiliation to schools, NGOs, institutes and so on.
One of the team had identical small back pack. I made a point that next year i
will also carry one so that water bottle, car key, phone, handkerchief etc
could be carried easily while running. By 6:30 A.M every inch of the vast area
right from Ram Leela Maidan to past Albert Hall was occupied. Later i came to
know that there were 70 thousand entries! No wonder the atmosphere grew from
sweet chirping to electrifying shrill and the clusters of balloons, colorful
banners of all shapes and sizes carrying varied social, health and
environmental messages. The hoop la kept the chill in the air at bay.
One Rajasthan- Police trainee asked me which race i was
undertaking. When i shook my head in big NO, she insisted me to accompany her
and the team.
There i spotted few senior citizens too displaying chest
numbers, then i saw an aged woman donning it. ‘Why i cannot give the run a try?’
crossed my mind. 'Next year for sure!' i decided.
I was ecstatic. Exactly two years ago I had undergone a
major surgery and took 4-6 months to recover. For a whole year I could not go
for morning walk as I needed extra sleep, extra rest in lack of which I used to
fall sick often. Reliance on my physical ability had dwindled. Here, today I
walked and run continuously without a single break! My hubby has always insisted
me to take things at ease. My mother in law forbade me to any heavy work out at
this age. But the delighted heart and bright face was telling a totally
different story.
Wait a moment! Did I
miss something? I traced five back steps and there people were clicking selfie
with a huge digital clock.
OMG! It’s just 55
minutes! I covered more than 6 KMs in less than an hour. Bravo!
Jaipur Marathon 2017! You are going to find me with you! And
the Dream Run of 6 KMs shall be finished in less than half of an hour!
* * * * * * * * * *
Monday, February 8, 2016
* प्रेम वेदी *
चल बैठें चर्च के पीछे
रंगबिरंगी मन्नतों की मोली के
घेरों से सजे उस बरगद के नीचे
जहाँ सुनाई देती है दूर से आती
प्रेम पगी पीली सी शाम की
मीठी अजान!
खोल लेंगे तेरी गठरी,
पोटली मैं अपनी ले आउंगी।
चुगेंगें अब तक के तेरे मेरे
जीवनमुल्य,अनुभव, संस्कार...
एक सी मान्यताओं पर
compatibility का सा अहसास
हम दोनों को
कुछ और करीब ले आएगा।
तेरी परंपराओं पर मैं
आँखे बड़ी बड़ी कर आश्चर्य जताऊंगी,
मेरे यहाँ के रीति रिवाजों पर
तुम गौरवान्वित हो जाओगे।
तुम्हारी गहरी आंखों में
मैं देवी सी झलकूंगी,
तुम मेरे खुदा हो जाओगे।
नए-नए आयामों का एक सांझा चूल्हा,
साँझी रसोई बनाएंगे।
वहीं सरहद सरजमीं पर मिल गले
हम जमाने की सलीब चढ़ जाएंगे।
आने वाली पीढ़ियों को
जीने की नई तरकीब दे जाएंगे।
************ मुखर, 8/2/16
प्यार के मौसम और वैलेंटाइन डे की अग्रिम शुभकामनाओं सहित।
Compatibility का हिंदी में शब्द जरूर बताएं :)
रंगबिरंगी मन्नतों की मोली के
घेरों से सजे उस बरगद के नीचे
जहाँ सुनाई देती है दूर से आती
प्रेम पगी पीली सी शाम की
मीठी अजान!
खोल लेंगे तेरी गठरी,
पोटली मैं अपनी ले आउंगी।
चुगेंगें अब तक के तेरे मेरे
जीवनमुल्य,अनुभव, संस्कार...
एक सी मान्यताओं पर
compatibility का सा अहसास
हम दोनों को
कुछ और करीब ले आएगा।
तेरी परंपराओं पर मैं
आँखे बड़ी बड़ी कर आश्चर्य जताऊंगी,
मेरे यहाँ के रीति रिवाजों पर
तुम गौरवान्वित हो जाओगे।
तुम्हारी गहरी आंखों में
मैं देवी सी झलकूंगी,
तुम मेरे खुदा हो जाओगे।
नए-नए आयामों का एक सांझा चूल्हा,
साँझी रसोई बनाएंगे।
वहीं सरहद सरजमीं पर मिल गले
हम जमाने की सलीब चढ़ जाएंगे।
आने वाली पीढ़ियों को
जीने की नई तरकीब दे जाएंगे।
************ मुखर, 8/2/16
प्यार के मौसम और वैलेंटाइन डे की अग्रिम शुभकामनाओं सहित।
Compatibility का हिंदी में शब्द जरूर बताएं :)
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