Monday, February 8, 2016

* प्रेम वेदी *

चल बैठें चर्च के पीछे
रंगबिरंगी मन्नतों की मोली के
घेरों से सजे उस बरगद के नीचे
जहाँ सुनाई देती है दूर से आती
प्रेम पगी पीली सी शाम की
मीठी अजान!
खोल लेंगे तेरी गठरी,
पोटली मैं अपनी ले आउंगी।
चुगेंगें अब तक के तेरे मेरे
जीवनमुल्य,अनुभव, संस्कार...
एक सी मान्यताओं पर
compatibility का सा अहसास
हम दोनों को
कुछ और करीब ले आएगा।
तेरी परंपराओं पर मैं
आँखे बड़ी बड़ी कर आश्चर्य जताऊंगी,
मेरे यहाँ के रीति रिवाजों पर
तुम गौरवान्वित हो जाओगे।
तुम्हारी गहरी आंखों में
मैं देवी सी झलकूंगी,
तुम मेरे खुदा हो जाओगे।
नए-नए आयामों का एक सांझा चूल्हा,
साँझी रसोई बनाएंगे।
वहीं सरहद सरजमीं पर मिल गले
हम जमाने की सलीब चढ़ जाएंगे।
आने वाली पीढ़ियों को
जीने की नई तरकीब दे जाएंगे।
************ मुखर, 8/2/16
प्यार के मौसम और वैलेंटाइन डे की अग्रिम शुभकामनाओं सहित।
Compatibility का हिंदी में शब्द जरूर बताएं :)

Tuesday, January 19, 2016

* प्रेम और पानी *


उसके शब्द फिर कौंध गए थे जहन में। 'लव यू ' ! नहीं , गुस्सा नहीं आया था मुझे. न ही मैं चिढ़ी थी. मगर ऐसी कोई आनंदित भी नहीं हो गयी थी। सभी रिश्तों के मूल में प्रेम ही तो है. फिर क्यों हर रिश्ते को नाम दिया जाये ?
सोचते सोचते मैंने गिलास भरा की नज़र पानी के सतह पर अटक गयी. लगा मैं पानी भीतर उतरने लगी हूँ. धीर गंभीर गहरा समुंद्र ! अथाह पानी. ..ओर न छोर। .... कहीं प्रशांत तो कहीं हिन्द महासागर। ... कहीं गर्म लहरें तो कहीं बर्फ़ानी धाराएँ। ... वही पानी ध्रुवों पर सदियों से जमा... धवल धवल !
...ओह्ह ! नाश्ता ! मैंने गिलास उठा पानी आटे में डाला ! ... कलकल की मीठी धुन में अमृत हो मिश्री सा पानी नदियों से बहता झरनों की ऊंचाइयां नाप रहा था। कभी ठहरा पानी गंदला सा बांस मारता ... जिसमें खिल रहे थे श्वेत कमल ! याद हो आया मुझे नीला काला हरा पानी जो कभी भूगोल की किताबों में पढ़ा तो कभी नेट जिओ चैनल पर देखा। ... मृत सागर के बारे में भी सुना है न ? और मानसरोवर की पवित्र झील के विषय में तो पढ़ा ही पढ़ा है। ... कि मुझे याद आ गया पानी का सबसे खूबसूरत रूप - जीवन दात्री रिमझिम बारिश ! सौंधी सी खुशबू... खुशबू ? खुशबू !!!
ईश्श्श ! परांठा उतारते तवा पर लग गयी थी उंगलियाँ ! कोई नहीं .
अच्छा सुनो sss ! नाश्ता लगा दिया।
"क्या है ?"
मेथी के परांठे ! बड़े प्रेम से बनाया है :)

Thursday, December 10, 2015

** कोई है ? **


वृहद् हिंदुस्तान
भारत पाकिस्तान हो गया।
भारतीय भी सिख ईसाई,
हिंदू मुसलमान हो गया।
हिंदू भी बटे हैं -
जाट, राजपूत, दलित,ब्राह्मण...
शहर, कस्बा, गांव, गली, मुहल्ला...
कुर्मी, चमार, गौड़, शारश्वत...
गोत्र, जात, ठिकाना हो गया।
चारदीवारी भीतर भी,
घर परिवार के अंदर ही,
कोई छोटा कोई बड़ा हो गया।
संतान भी बेटी बहू पराई,
बेटा कुल दीप हो गया!
बेटों में भी लड़ाई
दुकान मेरी, मकान तेरा,
माँ तेरी, बाप मेरा हो गया!

हे ईश्वर! या अल्लाह!!
देख तेरा इंसान क्या हो गया!
जुबां और बुद्धि के साथ भी
बिना सींग पूंछ का जानवर हो गया।
शाख शाख, पात पात...
जगद्गुरु बोधी वृक्ष बिखर गया!
तिलक तावीज सिरहाने दबा,
बाहर आओ!
आज हम सब एक हों जाएं!
अरे कोई है sss!
कोई है क्या sss!!
जी करता है...
किसी इंसान से आज गले मिल आएं!
------------------------- मुखर! (19 नवंबर 2015)

Tuesday, December 1, 2015

टीस

पेरिस? सीरिया? नेपाल? दादरी? गोधरा? '84?...उफ्फ!!

Thursday, October 29, 2015

* तू मेरा चाँद , मैं … *


वह एकदम स्लिम ट्रिम हो या गोलू मोलू , मुझे हमेशा ही सुन्दर लगता है। एकदम हंसमुख !  बचपन में ताँका झांकी थी.… तो कभी उंगलियाँ उलझाए भी हम घूमा फिरते । और अकसर वह मेरे पीछे पीछे !
फिर उम्र का वो दौर भी आया कि अहसास हुआ यह बचपन ही का नहीं जीवन भर का साथी है.… मन ज़रा भी उदास हो , उसका इंतजार रहता है।
उस तक पहुंचे लोग बताते हैं वह बेहद ठंडा और एकदम पत्थर ही है, जी चाहा चीख कर कहूँ कि इतने करीब जाओगे तो कोई भी पत्थर हो जायेगा !
 मैंने तो उसे जब भी देखा वह मुस्कुरा देता है....वह जब जब अपने पूरे शबाब पे आया हर ओर जैसे उत्सव ही छा गया।  उसके नए नए रूप को हर बार माँ भी निहारती , खीर बनाती , मुँह मीठा कराती … और कई बार तो जब तक वो आ नहीं जाता न कुछ खाती न पानी ही पीती ! कुछ तो बात है उसमें की सबका कान्हां बना फिरता है !
जीवन में दूधिया रौशनी और सौम्य सी ठंडक उसी से है...हाँ , हाँ वह और कोई नहीं नील गगन का राही चाँद ही है।  अब मैं भी जान गई  ही मन का नहीं वो, वो तो प्राणी मात्र में प्रेम तत्व का कारक है ! और इस बात को महिलाएँ आदि काल से विभिन्न व्याज से मनाती आई हैं।  चाँद से प्रेम अपने मन में भर भर के अपने परिवार व् प्रिय जनों पर लुटाने को !
 …........ मुखर
 

Friday, October 2, 2015

- बेदी -


हूं ना मैं बोरिंग!
एकदम आदर्शवादी!
.
आदर्श?
हाहाहाsss!
सुनो आज तुम एक कहानी,
एक सुंदर, चंचल अल्हड़ मन में जीवन में
आदर्श, कर्तव्य, जिम्मेदारी कैसे भर दी गई।
जब धन,संसाधन की समझ बढ़ी
और उनके दम पर सत्ता का जोर!
मालिकों को गुलामों की तलब
आबादी आधी आधी कर दी गई।
वैसे गुलामों की कमी नहीं थी।
मगर कोई ऐसा जो
मालिक की खुशी में खुश,
मालिक के सम्मान में मान
मालिक की मर्जी में मर्जी।
कमजोर से कमजोर,
मुर्ख से मुर्ख,
गरीब से गरीब आदमी को भी
एक अदद गुलाम तो मिले!
इसलिए आधी आधी आबादी।
आधी आबादी को
शरीर बनाया गया।
रिश्तों में बांधा गया।
(क्या औरत ही माँ, बहन, बेटी होती है?
पुरूष बाप,भाई, बेटा नहीं?)
सुंदरता अलंकारों, विशेषणों का
लबादा पहनाया गया।
लबादों के तहों में
मान आबरू बताया गया।
लबादों की जब वह आदी हो गई,
अपने ही आप से अनजान हो गई।
चीरहरण आसान हो गया।
तथाकथित मान को बचाने को,
उसे तिजोरी में, पिंजरे में,
चारदीवारी में रखा गया।
इस घर में हक ना मांगे,
सो पराया कर दिया गया।
उस घर में सब पति का,
उसके जाए बच्चों का भी!
मगर उसका नहीं!
हाँ! वह इतराती है।
अपनी सुंदरता पर,
महंगे कपड़ों पर, गहनों पर।
पिता पति के ओहदों पर
बच्चों की काबिलियत पर!
खुद का क्या?
अरे यही सब तो!!
कहते हैं -
जितना घूमोगे, उतना अनुभव।
जितना अनुभव, उतना ज्ञान।
युगों-युगों से युगों-युगों तक
उसके अनुभव -
घर बच्चे, चौका बर्तन।
और आंचल ढका मान।
न इच्छा, सपने, लोभ,लाभ
बस लाज,शर्म, कर्म, आब!
तुम आदर्शवादी नहीं,
आदर्शों के बेदी पर चढ़ी
भावनाओं की गठरी की बली हो!
***************** मुखर!

Wednesday, September 16, 2015

-विकास के मायने -


उनके पिता पेंट ब्रश से झाँकी, साइनेजेस बनाते थे। वे कंप्यूटर पर ग्राफिक्स डिजाइन कर इंकजेट मशीनों पर फ्लेक्स प्रिंट्स निकाल होर्डिंगस बनाते हैं। तरक्की!!
"ग्रामीण लोहारों की आखिरी पीढ़ी ने मुँह मोड़ा "
विकास का पहिया ज्यों ज्यों आगे घूम रहा है पुराने काम धंधे दम तोड़ते जा रहे हैं। यह आधुनिकता की विडंबना समझी जाएगी कि समाज के जिस कमजोर तबके का जीवन स्तर सुधारने और उन्हें देश की मुख्य धारा से जोड़ने के तमाम उपाय किए जा रहे हैं वही उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन गए हैं। खास कर पुश्तैनी हुनर से नई पीढ़ी अलग थलग पड़ गई है। भारतीय उपमहाद्वीप के सभी विकासशील छोटे देशों में हालात कमोबेश एक जैसे हैं। बांग्लादेश में ग्रामीण लोहारों की आखिरी पीढ़ी इस धंधे को भारी मन से अलविदा कहने को विवश है।तकनीकी तरक्की और औद्योगिकरण की तेज रफ्तार ने उन्हें अपना कामकाज समेटने को मजबूर किया। कस्बाई और शहरी पृष्ठभूमि के लोहार तो जैसे तैसे अपनी गुजर बसर लायक काम ढूंढ ही लेते हैं लेकिन उनकी संतानें इसे जीविकोपार्जन का साधन मानने को राजी नहीं।
यह बानगी तो चावल की हांडी में से एक दाने की है। अब हमें समझना होगा कि प्रकार विकास की आड़ में जमीन जायदाद धन समृद्धि का रूख मुट्ठी भर लोगों की तरफ कर दिया जाता है।
- अखबार में पढ़े एक आलेख से प्रेरित।