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Tuesday, January 19, 2016

* प्रेम और पानी *


उसके शब्द फिर कौंध गए थे जहन में। 'लव यू ' ! नहीं , गुस्सा नहीं आया था मुझे. न ही मैं चिढ़ी थी. मगर ऐसी कोई आनंदित भी नहीं हो गयी थी। सभी रिश्तों के मूल में प्रेम ही तो है. फिर क्यों हर रिश्ते को नाम दिया जाये ?
सोचते सोचते मैंने गिलास भरा की नज़र पानी के सतह पर अटक गयी. लगा मैं पानी भीतर उतरने लगी हूँ. धीर गंभीर गहरा समुंद्र ! अथाह पानी. ..ओर न छोर। .... कहीं प्रशांत तो कहीं हिन्द महासागर। ... कहीं गर्म लहरें तो कहीं बर्फ़ानी धाराएँ। ... वही पानी ध्रुवों पर सदियों से जमा... धवल धवल !
...ओह्ह ! नाश्ता ! मैंने गिलास उठा पानी आटे में डाला ! ... कलकल की मीठी धुन में अमृत हो मिश्री सा पानी नदियों से बहता झरनों की ऊंचाइयां नाप रहा था। कभी ठहरा पानी गंदला सा बांस मारता ... जिसमें खिल रहे थे श्वेत कमल ! याद हो आया मुझे नीला काला हरा पानी जो कभी भूगोल की किताबों में पढ़ा तो कभी नेट जिओ चैनल पर देखा। ... मृत सागर के बारे में भी सुना है न ? और मानसरोवर की पवित्र झील के विषय में तो पढ़ा ही पढ़ा है। ... कि मुझे याद आ गया पानी का सबसे खूबसूरत रूप - जीवन दात्री रिमझिम बारिश ! सौंधी सी खुशबू... खुशबू ? खुशबू !!!
ईश्श्श ! परांठा उतारते तवा पर लग गयी थी उंगलियाँ ! कोई नहीं .
अच्छा सुनो sss ! नाश्ता लगा दिया।
"क्या है ?"
मेथी के परांठे ! बड़े प्रेम से बनाया है :)
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