Thursday, December 10, 2015

** कोई है ? **


वृहद् हिंदुस्तान
भारत पाकिस्तान हो गया।
भारतीय भी सिख ईसाई,
हिंदू मुसलमान हो गया।
हिंदू भी बटे हैं -
जाट, राजपूत, दलित,ब्राह्मण...
शहर, कस्बा, गांव, गली, मुहल्ला...
कुर्मी, चमार, गौड़, शारश्वत...
गोत्र, जात, ठिकाना हो गया।
चारदीवारी भीतर भी,
घर परिवार के अंदर ही,
कोई छोटा कोई बड़ा हो गया।
संतान भी बेटी बहू पराई,
बेटा कुल दीप हो गया!
बेटों में भी लड़ाई
दुकान मेरी, मकान तेरा,
माँ तेरी, बाप मेरा हो गया!

हे ईश्वर! या अल्लाह!!
देख तेरा इंसान क्या हो गया!
जुबां और बुद्धि के साथ भी
बिना सींग पूंछ का जानवर हो गया।
शाख शाख, पात पात...
जगद्गुरु बोधी वृक्ष बिखर गया!
तिलक तावीज सिरहाने दबा,
बाहर आओ!
आज हम सब एक हों जाएं!
अरे कोई है sss!
कोई है क्या sss!!
जी करता है...
किसी इंसान से आज गले मिल आएं!
------------------------- मुखर! (19 नवंबर 2015)

Tuesday, December 1, 2015

टीस

पेरिस? सीरिया? नेपाल? दादरी? गोधरा? '84?...उफ्फ!!

Thursday, October 29, 2015

* तू मेरा चाँद , मैं … *


वह एकदम स्लिम ट्रिम हो या गोलू मोलू , मुझे हमेशा ही सुन्दर लगता है। एकदम हंसमुख !  बचपन में ताँका झांकी थी.… तो कभी उंगलियाँ उलझाए भी हम घूमा फिरते । और अकसर वह मेरे पीछे पीछे !
फिर उम्र का वो दौर भी आया कि अहसास हुआ यह बचपन ही का नहीं जीवन भर का साथी है.… मन ज़रा भी उदास हो , उसका इंतजार रहता है।
उस तक पहुंचे लोग बताते हैं वह बेहद ठंडा और एकदम पत्थर ही है, जी चाहा चीख कर कहूँ कि इतने करीब जाओगे तो कोई भी पत्थर हो जायेगा !
 मैंने तो उसे जब भी देखा वह मुस्कुरा देता है....वह जब जब अपने पूरे शबाब पे आया हर ओर जैसे उत्सव ही छा गया।  उसके नए नए रूप को हर बार माँ भी निहारती , खीर बनाती , मुँह मीठा कराती … और कई बार तो जब तक वो आ नहीं जाता न कुछ खाती न पानी ही पीती ! कुछ तो बात है उसमें की सबका कान्हां बना फिरता है !
जीवन में दूधिया रौशनी और सौम्य सी ठंडक उसी से है...हाँ , हाँ वह और कोई नहीं नील गगन का राही चाँद ही है।  अब मैं भी जान गई  ही मन का नहीं वो, वो तो प्राणी मात्र में प्रेम तत्व का कारक है ! और इस बात को महिलाएँ आदि काल से विभिन्न व्याज से मनाती आई हैं।  चाँद से प्रेम अपने मन में भर भर के अपने परिवार व् प्रिय जनों पर लुटाने को !
 …........ मुखर
 

Friday, October 2, 2015

- बेदी -


हूं ना मैं बोरिंग!
एकदम आदर्शवादी!
.
आदर्श?
हाहाहाsss!
सुनो आज तुम एक कहानी,
एक सुंदर, चंचल अल्हड़ मन में जीवन में
आदर्श, कर्तव्य, जिम्मेदारी कैसे भर दी गई।
जब धन,संसाधन की समझ बढ़ी
और उनके दम पर सत्ता का जोर!
मालिकों को गुलामों की तलब
आबादी आधी आधी कर दी गई।
वैसे गुलामों की कमी नहीं थी।
मगर कोई ऐसा जो
मालिक की खुशी में खुश,
मालिक के सम्मान में मान
मालिक की मर्जी में मर्जी।
कमजोर से कमजोर,
मुर्ख से मुर्ख,
गरीब से गरीब आदमी को भी
एक अदद गुलाम तो मिले!
इसलिए आधी आधी आबादी।
आधी आबादी को
शरीर बनाया गया।
रिश्तों में बांधा गया।
(क्या औरत ही माँ, बहन, बेटी होती है?
पुरूष बाप,भाई, बेटा नहीं?)
सुंदरता अलंकारों, विशेषणों का
लबादा पहनाया गया।
लबादों के तहों में
मान आबरू बताया गया।
लबादों की जब वह आदी हो गई,
अपने ही आप से अनजान हो गई।
चीरहरण आसान हो गया।
तथाकथित मान को बचाने को,
उसे तिजोरी में, पिंजरे में,
चारदीवारी में रखा गया।
इस घर में हक ना मांगे,
सो पराया कर दिया गया।
उस घर में सब पति का,
उसके जाए बच्चों का भी!
मगर उसका नहीं!
हाँ! वह इतराती है।
अपनी सुंदरता पर,
महंगे कपड़ों पर, गहनों पर।
पिता पति के ओहदों पर
बच्चों की काबिलियत पर!
खुद का क्या?
अरे यही सब तो!!
कहते हैं -
जितना घूमोगे, उतना अनुभव।
जितना अनुभव, उतना ज्ञान।
युगों-युगों से युगों-युगों तक
उसके अनुभव -
घर बच्चे, चौका बर्तन।
और आंचल ढका मान।
न इच्छा, सपने, लोभ,लाभ
बस लाज,शर्म, कर्म, आब!
तुम आदर्शवादी नहीं,
आदर्शों के बेदी पर चढ़ी
भावनाओं की गठरी की बली हो!
***************** मुखर!

Wednesday, September 16, 2015

-विकास के मायने -


उनके पिता पेंट ब्रश से झाँकी, साइनेजेस बनाते थे। वे कंप्यूटर पर ग्राफिक्स डिजाइन कर इंकजेट मशीनों पर फ्लेक्स प्रिंट्स निकाल होर्डिंगस बनाते हैं। तरक्की!!
"ग्रामीण लोहारों की आखिरी पीढ़ी ने मुँह मोड़ा "
विकास का पहिया ज्यों ज्यों आगे घूम रहा है पुराने काम धंधे दम तोड़ते जा रहे हैं। यह आधुनिकता की विडंबना समझी जाएगी कि समाज के जिस कमजोर तबके का जीवन स्तर सुधारने और उन्हें देश की मुख्य धारा से जोड़ने के तमाम उपाय किए जा रहे हैं वही उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन गए हैं। खास कर पुश्तैनी हुनर से नई पीढ़ी अलग थलग पड़ गई है। भारतीय उपमहाद्वीप के सभी विकासशील छोटे देशों में हालात कमोबेश एक जैसे हैं। बांग्लादेश में ग्रामीण लोहारों की आखिरी पीढ़ी इस धंधे को भारी मन से अलविदा कहने को विवश है।तकनीकी तरक्की और औद्योगिकरण की तेज रफ्तार ने उन्हें अपना कामकाज समेटने को मजबूर किया। कस्बाई और शहरी पृष्ठभूमि के लोहार तो जैसे तैसे अपनी गुजर बसर लायक काम ढूंढ ही लेते हैं लेकिन उनकी संतानें इसे जीविकोपार्जन का साधन मानने को राजी नहीं।
यह बानगी तो चावल की हांडी में से एक दाने की है। अब हमें समझना होगा कि प्रकार विकास की आड़ में जमीन जायदाद धन समृद्धि का रूख मुट्ठी भर लोगों की तरफ कर दिया जाता है।
- अखबार में पढ़े एक आलेख से प्रेरित।

Friday, August 28, 2015

* राखी की चमक *


अरे तू गुस्सा ही हुए जाएगी या सुनेगी भी ?
'खा लिया ना खाना ! राखी भी बांध दी मैंने ! अब बोल ! एकदम तसल्ली से !
मैं करीब पौने बारह बजे निकल गया था तेरी भाभी को घर ड्राप करके यहाँ आने को। ज्यों ही बाइक जे.एल.एन. पर टर्न की थोड़ी दूर पर एक पिक-अप किसी को टक्कर मार कर चली गई। एक बारगी तो सोचा कि मैं तो चलता हूँ ! पीछे मुड़ कर देखा वो अभी तक पड़ा था जमीन पर। सभी जने बचकर निकले जा रहे थे। हालत नाजुक थी। फ़टाफ़ट पी.सी.आर और एम्बुलेंस को फोन करके तुझे किया कि देर हो जाएगी। इंतजार करते हुए मैंने देखा सड़क पर बिखरे सामान में चिथड़ा हो चुका एक गिफ्ट पैकेट था। फोन पे लास्ट कॉल 'छुटकी ' नाम से था। मुझे माज़रा समझते देर नहीं लगी ! पुलिस की तफ़्तीश और एम्बुलेंस के जाने के बाद मैं स्टेचू सर्कल पे ट्रेफिक जाम में फंस गया। कोई रैली निकल रही थी। गली में मुड़ा कि मुझे एम्बुलेंस की सायरन सुनाई दिया। इतनी भीड़ भाड़ में हर किसी को देर हो रही थी। आज़ अन्य दिनों से कुछ ज्यादा ही जल्दी थी लोगों को।
' कुछ कर सकता हूँ ? ' - एम्बुलेंस के करीब जा कर मैंने ड्राइवर से पुछा !
' आप प्लीज़ यहाँ से निकलवा कर कोई शॉर्टकट बता देते ' - ड्राइवर की बेचारगी साफ़ झलक रही थी।
मैं आगे आगे चलते हुए प्रार्थना कर रहा था ' हे भगवन ! रक्षा करना इसकी। '
अस्पताल पहुँच कर पता लगा खतरे की कोई बात नहीं। हाँ, खून जरूर चढ़ाना पड़ा !
' तो तूने आज फिर ब्लड डोनेट कर दिया ?'
' तो फिर ? ' घर से उसका भाई आ गया था जिसे मैंने तेरे लिए लिया गिफ्ट यह कह कर दे आया कि यह उसकी बाइक के पास मिला था। मैंने सही किया ना ?
' हाँ ! बिलकुल सही ! मानव धर्म निभाया तूने ! इससे बेहतर और क्या हो सकता था !' वह आंसू पोछते हुए बोली।
' चल चल, अब अपना धर्म निभा ! कहाँ है मेरे रसगुल्ले का डब्बा ! '....
आज राखी की और दोनों के चेहरे की चमक कुछ और ही थी ! आज उन्होंने सबसे ऊंचे धर्म, मानव धर्म को पहचाना था !
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Saturday, August 22, 2015

सुना क्या आपने -


मोदी : 60 हज़ार दूँ की ज्यादा दूँ ?
जनता : मोदी मोदी
मोदी : 70 हज़ार करोड़ दूँ की ज्यादा दूँ ?
जनता : मोदी मोदी
मोदी : 80 हज़ार करोड़ दूँ की ज्यादा दूँ ?
जनता : मोदी मोदी
90 हज़ार करोड़ दूँ की ज्यादा दूँ ?
जनता : मोदी मोदी
ये जनता है की मूर्खों की भीड़ ? इन्हें नहीं पता की ये
उन्ही के खून पैसों की कमाई है ? इन्हें नहीं पता की ये
पैसा उन्हें 1 साल पहले मिल जाता तो शायद एक चूल, एक
पूल या एक सड़क अब तक बन गई होती ? इन्ही का पैसा
इन्हें ऐसे देने की बात हो रही थी जैसे भिखारी को राजा
चिढ़ा रहा हो, एक रूपये दूँ की 2 रूपये दूँ ??
( फेसबुक पर किसी का लिखा हुआ कमेंट)
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हम सोचे -
मतलब मामला सौदे का है! वह भी देश के प्रधानमंत्री द्वारा? भई वाह!
वैसे एक बात कह दें हम भी। आप मोदी जी को सही से समझे नहीं। वे देश के प्रधानमंत्री हैं, एकदम सच्चे सेवक। बिहार भी उसी देश का हिस्सा है, इतना भूगोल तो याद है उनको। अब वो किसी पार्टी वार्टी के नेता जैसा संकीर्ण सोच नहीं रखते! बिहार की जनता उनकी पार्टी को वोट दे या नितीश को, जो पैकेज का वादा किया है वो निभा कर रहेंगे। चाहे तो शाह लिख कर दे देंगे कि इस बार वाला कोई जुमला नहीं है।
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किसी का जवाब जोरदार था -
चाहें लाख लिख कर दे दें ... ससुरे करेंगे सब काम फाईलों में भी (गर जुमला न हुआ तो) ये गुजराती बनिए हैं... बिहारियों में दाल नहीं गलनी इनकी ...
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चल बुड़बक ! कौनो हम ही बुद्धु हैं का ! जब कुछ होने जाने का हैइऐ नहीं त काहे न अपनी मर्जी से वोट दें , मतबल घर का आदमी ।
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जय हो नागनाथ , i mean नागपञ्चमी की !

( sorry for delayed post )