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Wednesday, October 19, 2016

*मनोदशा *

कभी कभी आवाजें कान पर तो पड़ती हैं मागर मन में कहीं कोई हलचल नहीं पैदा करती। मन , शांत , मृत सागर सा गंभीर। ऐसा सन्नाटा जैसे सावन के महीने में जेठ अतिक्रमण कर गया हो। जैसे जेठ की ठहरी सी दुपहरी में दूर किसी कठफोड़वे की ठक ठक , किसी कमठे की ठक ठक सी ही उदासीन सांसों की आवाजाही और दिल की धड़कन। जिनके होने न होने में कोई अंतर ही ना रह गया हो। सारे सारे दिन के तड़प के बाद भी बिना कुछ कहे... वहाँ दूर जहाँ धरती आकाश मिलते हैं न , आज़ भी सूरज बिना कुछ कहे , बिन कुछ सुने... वहीँ क्षितिज़ मन की सागर सतह पर धंस गया। घिर आए तिमिर में भीतर ही भीतर कोई लावा बहता है। सब रेत करता है। चेहरे की झांई और आँखों के लाल डोरे.. तप्त ह्रदय के चुप से अल्फ़ाज़ !
इस बीच तुमने कुछ कहा हो तो , माफ़ करना !
- " मुख़र "
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