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Wednesday, August 30, 2017

एक गज़ल :


आज जी भर क्यूँ न इस तौर से रोया जाए,
अपना दामन खून-ए-कातिल से भिगोया जाए।
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शहर के सूखते दरिया नज़रअंदाज़ कीजे, ...

आग जब तक न लगे, चैन से सोया जाए।
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अपने हाथों में जो है वक़्त का एक बीज उसे,
कौन काटेगा फ़सल भूल कर बोया जाए।
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ये तो मुमकिन ही नहीं आप मसीहा हो मग़र,
मेरे काँधे पे सलीब आपका ढोया जाए।
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क्या हुआ जो हकीकत में है तामील कठिन,
कम से कम ख्वाब तो आँखो में संजोया जाए ।





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