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Monday, June 12, 2017

" कसक "


तितलियों संग मचलती हूँ ,
मैं बादल संग पिघलती हूँ ,
झिलमिल झिलमिल तारों संग ,
बरखा संग रिमझिम गिरती हूँ।
खुशियां मेरी अनंत अपार ,
दिखाऊँ कैसे तुमको हर बार ।

रह रह जब उठती है कसक ,
आँखों से फिर तो टप टप टप ,
उतरा मुख और उदास मन ...
देखूं अस्ताचल बस एक टक. ..
दुःख का ना कोई पारावार ,
बतलाऊँ क्या तुमको हर बार ।
हवाओं पर तो मैं चलती हूँ ,
पंखुड़ी पर जा ठहरती हूँ ,
मोर मोर मैं ही नृत्यरत ,
कलकल में भी मेरा राग ,
धड़कन मेरी अनंत अपार
बांटूं कैसे तुमसे हर बार ।
सुख की , दुःख की , जैसी भी हो ,
घडी घडी तुम आते याद ,
सोचूं मैं बरबस बैठी -उठती ,
जतलाऊँ क्या यह बारम्बार !
- मुखर
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