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Tuesday, March 3, 2015

- रंग ऊमंग संग -
रसोई से उठती महक परिवार के हर छोटे बडे सदस्य में उत्साह भर रहा है। सूरज को सर उठाए एक प्रहर भी नहीं हुआ और गली मुहल्ले में कर्णप्रिय हुल्लड सभी को चुम्बक की तरह अपनी ओर खींच रहा है। अभी हाल ही में दिवाली पर पुताई गई घर की दिवारों की भी चिंता किसी गृहलक्ष्मी को नहीं है। आखिर होली का त्यॊहार है ही ऐसा। साल में एक ही बार तो आता है। ( ये ऒरतें भी न ! जाने कैसी कैसी दलील देतीं हैं ! त्यॊहार तो सारे ही सालाना होते हैं ना ? :)
 मैं भी खुश होने की पूरी कोशिश में हूं। आबीर गुलाल की तरह घुल जाना चाहती हूं इस फ़ागुनी फ़िजाओं में । मगर कुछ ...कुछ कमी सी है क्या ?
" अरे भई रसोई हि में घुसी रहोगी ? बाहर तुमहारे लियॆ पुकार हो रही है। डर गई क्या ? हाहाहा..."
" जो पुकार रहीं हैं ना , उन्हीं की डिमांड थी मेरे हाथ के कांजी बडे की । तुम चलो, मैं बस आती हूं । "


बाहर बाल्कनी में मिठाई की ट्रे और बडे की हांण्डी रख गुलाल का पैकेट उठाने मेज पर आई तो देखा इतने साssरे रंग ! इतने प्यारे प्यारे रंग ! हर रंग पर दिल मचल मचल जाये ऎसे रंग !

 मगर मेरी आंखें ऎसे ढूंढ रही थी जैसे अभी कोई रंग बाकी रह गया । मगर कौन सा रंग ? अलसुबह से कुछ बैचॆनी सी है ...जैसे कुछ ...कोई सा रंग ढूंढ रही हूं...इस मेज पर आकर भी मेरी वह ढूंढ खत्म नहीं हुई थी।
इस बार सब कुछ ही तो है मेरे पास। बिल्कुल वैसा ही जैसा मैं हमेशा से चाहती थी ।

फ़िर ? फ़िर क्या कारण है कि एक बहाना ढूंढ लेना चाह्ती हूं इन रंगों से दूर किसी एकांत के लिये ?
                                                                                                                              - मुखर की डायरी से ।
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