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Wednesday, September 3, 2014

*अंजुरी *


कभी कोई एक दुख पर ही 
नहीं लिखी जाती है कोई कविता ।
बूंद बूंद रिस्ते दर्द एकत्रित करती है ,
हृदय की मेरी अंजुरी !
किसी सखाभाव की गर्माहट से
वास्पित होती कुछ बूंदे तो 
कभी अपने लगा देते हैं मरहम
उभर आये जख्मों पर !

मगर जाने कहाँ से, कैसे,
क्यों तो  कितने ही दर्द 
रिस्ते रिस्ते, रचते, बनते
बिखर जाती है पन्नों पर 
 दर्द भरी कोई कविता
या मीठी सी ही कोई रचना 
सुना है प्रेम के आंसू खारे नहीं होते।

फिर !
तूफान के बाद की शांती !
जिंदगी फिर मचलने लगती है
हौले हौले ,
और फैला देती हूँ मैं एक बार फिर 
हरीतिम हृदय की उर्वर
धुलि धुलि अंजुरी !  
                - मुखर !


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