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Tuesday, June 4, 2013

ऍफ़ बी पार्क

ऍफ़ बी पार्क

बस यहीं ब्राउजर को पार कर

माउस क्लीक से सटा सा
अपने मेल ई डी के मोड़ पर 
पासवर्ड के जस्ट सामने
एक पार्क है - ऍफ़ बी .
ओफिस के काम पर जाना हो,
या मार्किट, सर्फिंग, या अपनी
' हॉबी क्लासेस - मुखर ब्लॉग  '
इसी पार्क से हो कर गुजरती हूँ !
किसी बेंच पर बैठे अधेड़, प्रोढ़, बुजुर्ग
उधेड़ते राजनीति
देश के बेमौसम बरसात का
मौसम विभाग की तरह, आता जाता
सच्चा, या सच के थोडा करीब सा पैगाम .
इस तरह ऍफ़ बी के पार्क में
होते हैं कुछ खास,
कुछ बहुत खास प्रोफाइल
बाकी सारे हम जैसे आम !
पार्क के बीच में फौव्वारे सा
शेर औ शायरी का मुशायरा
दिनभर की थकान को
पल भर में मिटा, देता आराम !
पथ के दोनों ओर
नामी और नए रचनाकारों के
कविताओं का रंगबिरंगी
दूर तक लहराती क्यारियाँ
http://vikalpmanch.wordpress.com/ '
के कुछ विदेशी गुल
भरते आँखों में सपने
महकाते है जीवन, भुलाते दुश्वारियां !
तो कहीं ऊंचे लम्बे, बेहद उपयोगी से
विमलेन्दु जी द्वारा लिखे निबन्ध !
इन सबसे गुजरते हुए
आज कुछ ठहर जाने का मन हुआ
तो प्रेम भरद्वाज जी की
एक लम्बी सी कहानी का
टेका लगा लिया...
या हिंदीसमय/साहित्य/ कविता कोष,  
ज्यों  'पार्क की लाइब्रेरी ',
का एक
चक्कर लगा लिया !
शोभा मिश्रा, रश्मि भरद्वाज, स्वर्ण कांता
आदि  के ब्लॉग/पोस्ट
एक नयी शक्ति से
क्रांति की आती बहार से
परिचय कराते हैं !
नियम से  बरगद के तने पर
श्रध्दा  सुमन चढाते,
स्पीकिंग ट्री वेबसाईट पढ़ आते
हम भी रोज थोड़े बुध हो जाते हैं ! 
यहाँ एक बहुत ऊंचा सा झंडा है
जिस पर फहराता है
आशा, सच्चाई और जोश-
मेरी सहेली कविता कृष्णन के पोस्ट !
कुछ किशोर/ कुछ बालक
अपने टैलेंट के झूलों पर
लेते ऊंची पेंग !
कभी कभी एक बाँसुरीवाला
श्वेताम्बरा की मीठी धुन है बजाता !
कहीं चलती गोष्ठियां
कहीं तीखी बहस
तो कहीं चुहलबाजियाँ !
समाज की सेहत की नब्ज पर
हाथ रखते कुछ पेजेस/ग्रुप्स
हर पार्क में होता है एक जॉगिंग ट्रैक
यू & आई  फाउनडेशन !
या एक खेल का मैदान
मारवाड़ स्पोर्ट्स क्लब !
कुछ इधर उधर से चेपे हुए
जोक्स/ व्यंग/ कार्टून्स/कोटेशन्स के रेले 
जैसे गेट के जस्ट लग के
चनाचूर, आइसक्रीम, पानीपूरी के ठेले...
ssh  ! किसी को बताना मत !
आपको मेरी कसम !!
एक सॉफ्ट कोर्नर भी है यहाँ मेरा,
रंजू भाटिया का 'अमृता प्रीतम ' !
एज इफ कार्डियो, फिजिकल, मेंटल, स्पिरिचुअल
सभी हेल्थ का एक ही नुस्खा...
सुबह शाम इस पार्क में आते जाते
कई चेहरे लगने लगे हैं जाने पहचाने
दोस्ती मर्करी सी घटती बढती एक महीन रेखा
कौन कितने अपने , कौन कितने बेगाने !
                                             - मुखर !
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