Tuesday, February 15, 2022
"जड़ कौन ?"
Thursday, January 13, 2022
"ड्राइवर"
" ड्राइवर " लघुकथा
नीलू की आज पुरानी सखी सोनी सपरिवार मिलने आई थी। चाय नाश्ते पर हल्की फुल्की बातें चल रही थी।
"टिंकू नहीं दिख रहा ?" सोनी ने मठरी खाते हुए पूछा ।
"बेटू की ऑनलाइन क्लास चल रही है। खत्म होने को है !"
तभी भीतर कमरे में से बेटू की आवाज़ आई, "शिशुपाल !" ऑनलाइन क्लास में शिक्षिका महाभारत का कोई प्रसंग प्रश्नोत्तरी से समेट रही थी।
"तू बता ! बड़े समय बाद निकाली फुरसत घर आने की , हैं ? " नीलू ने मीठा उलाहना दिया ।
"क्या करूं यार ये मुई नौकरी न जीने देती है ना मरने । अच्छा है जो तू इन पचड़ों से दूर है।" कहते हुए सोनी ने तिरछी निगाहें अपने पति पर डाली।
कुछ ताड़ते हुए नीलू ने बात संभाली, "तेरी दो टकिए की नौकरी में ..." और बैठक ठहाकों से गूंज गया ।
"चलो चलो ! रिवर फ्रंट चलते हैं घूमने ! " सोनी चहकी।
"बस ड्राइवर बनाए ले चलती हो हमें हर कहीं !" उसके अर्धाँग ने जुबां खोली।
"अरे भई ऐसी भी क्या बात है ! मैं तो ड्राइविंग बहुत एंजॉय करती हूं !" नीलू ने फिर बात संभाली।
सोनी ने नम आंखों से सहेली को बताया कि उसकी जिंदगी ही ड्राइवरी करते गुजर रही है। स्कूल से लौट घर में कदम रखने से पहले ही अस्पताल, बाज़ार, मन्दिर जाने की तैयारी रहती है किसी न किसी की।
नीलू चाय और नाश्ते की ट्रे उठा रसोई की ओर मुड़ी। सोनी साथ साथ हो ली। उसने नीलू से मन की बात सांझा की , "संयुक्त परिवार में रह कर परिवार की देखभाल और नौकरी की दोहरी जिम्मेदारी तो खुशी खुशी कोई निभा भी ले। लेकिन ये ताने, उफ्फ ! मेरी सैलरी भी पारिवारिक जरूरतों में कहां खप जाती है पता ही नहीं चलता।"
अब तक बेटा लैपटॉप बंद कर बाहर कमरे में आ गया था।
नीलू खाने की तैयारी कर ही रही थी कि सोनी ने टोक दिया।
"सुन ना ! खाना बाहर ही खा आयेंगे ! वहीं चौपाटी पर !"
"चौपाटी ! मैं तो कब से सोच रही थी !" नीलू उत्साहित हो गई। "बेटू ! कपड़े मत बदलना ! मुंह धो कर कंघी कर लो और जूते पहन लो। अपन चौपाटी चल रहे हैं!" नीलू ने जल्दी जल्दी पर्स और दुपट्टा उठाया।
चलने की तैयारी में दोनों आदमी भी उठ खड़े हुए। सोनी के पति ने फिर एक खोखला सा चुटकुला सुनाने के अंदाज़ में जुबां खोली, "हमको एटीएम बना ले चलोगी !" दोनों मर्द फिर हंस दिए । सोनी तिलमिला गई।
नीलू और सोनी की निगाहें टकराईं !
सोनी से रहा नहीं गया, "आप बेटू के साथ बच्चियों की तरह बस मेला एंजॉय करना ! ड्राइविंग भी हम कर लेंगे और एटीएम भी मैं अपना ही निकालूंगी !" उसने आखिर मन की भड़ास निकाल ही दी।
ठीक इसी समय तैयार हो बेटू अपनी उंगली छत की ओर उठाए बैठक में प्रवेश किया, "और कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र चलाया!"
आज कार की फ्रंट दोनों सीट पर स्त्रियां बैठी थीं। दोनों के पतियों को बेटू संग पीछे बैठना पड़ा ।
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कविता "मुखर", जयपुर
13/1/22 को दैनिक नवज्योति में प्रकाशित
Tuesday, August 13, 2019
* खुशफहमी * - कहानी
“दिनों बाद ? महीनोंss बाद !”
“हम्म्म !...मैंने इस पर एक कविता लिखी है. -
"हमारे शहर में सूरज नहीं उगता है ,
भरी दुपहरी या ,
धुप्प अँधेरा रहता है .
हमारे शहर में सूरज नहीं उगता है !”
पंक्तियाँ सुना कर हंसिनी उसके चेहरे की तरफ देखती है . एक संतोष और मान देती मुस्कराहट देखकर ख़ुशी महसूस करती है . अब वो मुस्कुराहट इसलिए थी कि हंसिनी ने दो ही पंक्तियाँ सुनाई थी या इसलिए कि पंक्तियाँ वाकई प्रभावी थी या फिर उसका ही मूड इस सुनहरी सुबह में अच्छा था ...हंसिनी इन सब पेचीदगियों में नहीं पड़ना चाहती. वह अपनी इन छोटी-छोटी खुशियों को कभी भी दाँव पर नहीं लगाती.
“देखो ! वो बस ! ठीक है ना ?”
“वो ? फड़फड़ ? रस्ते भर उसकी खिड़कियाँ फड़फड़ बजती रहेंगी...सीट सख्त होगी...तेज हवा के थपेड़े चेहरे पर चोट करते रहेंगे ...कोई आरामदायक बस हो कि बैठते ही, सर टिकते ही आँखें लग जाएँ. एक तो आज अन्य दिनों की बनिस्पत जल्दी उठ गई , ऊपर से ठन्डे-ठन्डे पानी से नहा ली हूँ...दिमाग एकदम ठंडा हो रहा है ...मीठी-मीठी नींद के घेर आ रहे हैं.”
शहर के पश्चिमी छोर पर यह दो-सौ-फीट बाई-पास चौराहा है . हाँ, यही नाम है इस चौराहे का जहाँ दिल्ली की ओर से आती एलेवेटेड रोड बिना जमीं पर टिके चौराहे के ऊपर से ही एक सौ साठ डिग्री पर अजमेर को मुड़ जाती है। सुबह के कोई सात बजे यहाँ शहर के अन्य भाग से अधिक गहमा-गहमी रहती है. मानसरोवर, मालवीयनगर व शहर के आधे हिस्से को जोडती इस राष्ट्रीय मार्ग का ही प्रयोग करते हैं शहरी. जाने ऐसा क्यों होता है कि हर सुबह पूरे शहर को नौकरी या अन्य काम पर या फिर स्कूल कॉलेज के लिए शहर के दूसरे ही हिस्से में जाना होता है और फिर शाम को एक बार फिर पूरा शहर उलट-पुलट होता है अपने-अपने घर लौटते हुए. वो तो आज शिक्षण संस्थानों व् दफ्तरों में नवरात्रों के अष्टमी की छुट्टी है. तो आज लोग अपने-अपने दबड़ों में लम्बी नींद निकाल रहे हैं, सड़कें उबासियाँ ले रहीं हैं और यह चौराहा अलसाया सा आँखें झपका रहा है.
अगली बस के इंतजार में दोनों रेलिंग का सहारा लिए खड़े हैं. हंसिनी की नजर उसके चेहरे पर एक बार फिर जा अटकती है... उसकी निगाह कहीं दूर पूर्व की दिशा में सिन्धी बस कैंप से आती किसी बस को ढूँढ़ रही है ...चेहरे पर ताजगी है..दमक रहा है ...उसकी आँखें बड़ी नहीं हैं मगर उगते सूरज के प्रतिबिम्ब लिए सुनहरी संभानाओं सी चमक रहीं हैं.
“लो आ गई बस !” उसने कहा तो हंसिनी की तन्द्रा टूटी . वह सोचती है कि वह वर्तमान का अतिक्रमण कर कहाँ से कहाँ खो जाती है और वह दूरदृष्टि लिए हुए भी कितना प्रेजेंट में रहता है !...उसे बाय कर हंसिनी बस में चढ़ जाती है. संस्कारों के किसी सिग्नल के सहारे वह बस की सभी खाली सीटों को नज़रंदाज करते हुए पिछले हिस्से में किसी महिला ही के बगल में खाली सीट पा बैठ जाती है . वह महिला खिड़की से बाहर किसी से बात कर रही है. हंसिनी यह नहीं मानना चाहती कि वह महिला अपने पति ही से बातें कर रही है.
“थे चिंता मत करजो !... नाश्तो कर लीजो !... अच्छा चालूँ ! ध्यान राखजो थे !”
कितने गुलाबी अहसास हैं न इस वाक्य में , "ध्यान रखना अपना !” जैसे कि जिसको कहा जा रहा है वह इसीलिए अपना ध्यान रखेगा क्योंकि किसी ने कहा था उसे ऐसा करने को ! और होता भी ठीक ऐसा ही है। हंसिनी कल्पना कर रही है कि वह बाइक वाला पुरुष किक मारते ही अपने खुद के ‘किक’ के लिए एक बीड़ी सुलगा लेता है . और कश मारने से पहले ही कुछ याद करके मुस्कुराते हुए बीड़ी नीचे गिरा कर जूतियों से कुचल कर गाड़ी आगे बढा देता है. हंसिनी भलीभांति जानती है कि वक़्त और उम्र के साथ ह्रदय से जुबां तक की धमनियां और रक्त वाहिनियों के आसपास की दीवारें और मज्जा लचीलापन खो देती हैं ...उनमें बहता प्रेमरस कनपटियों तक नहीं पहुँचता है ...लालिमा अब नहीं छाती कपोलों पर...बोलते लब कांपते नहीं हैं ...आँखें पनीली नहीं होती...”ध्यान रखना अपना” मात्र एक औपचारिक हो जाता है ...मशीनी सा कानों पर पड़ता है...सुनने वाले के कान भी अब सवेंदनशील नहीं रह गए. बेहद मतलबी हो गए हैं . वही सुनते हैं जो सुनना चाहते हैं...”ध्यान रखना अपना” वहीँ कान के परदे के बाहर ही बिखर जाता है ...अपना असर खो देता है.
मगर किसी और द्वारा किसी और के लिए कहे शब्दों की मिठास में हंसिनी डूब जाना चाहती है. वह अपनी सीट पर सेटल होने की कवायद में पाती है कि वह सीट तो पीछे हो ही नहीं रही . दूसरी तरफ की खिड़की पर बैठे आदमी से पूछती है – “वो सीट बेक हो रही है क्या?”
वह आदमी आँखें उठाकर खुबसूरत प्रश्नकर्ता की ओर देखता है और पल भर में ही बिना कुछ कहे हाथ का काम छोड़ चेयर के पुश बटन दबा कर चेयर पीछे करता है. सही पा कर हंसिनी उधर शिफ्ट होने के लिए खड़ी होती है कि वह आदमी चेयर को अपने हाथों से झाड़ता है. उसका ऐसा करना हंसिनी को अच्छा लगता है. वह सीट पर एडजस्ट होती है , अपना बैग ठीक करती है. उसकी कोहनी उस आदमी के कोहनी से एक दो बार हलके से छू जाते हैं. “ये शहर की लड़कियां भी !” वह सोचता होगा , ऐसा हंसिनी कल्पना करती है . बस चल पड़ी है. हवा के झोंके भले लगते हैं . वह आँखें बंद कर लेती है. फिर तो पूरा दिन हेक्टिक रहने वाला है. वह अपने पर्स में हाथ डाल माइग्रेन की टेबलेट चेक करती है. बस गति पकड़ चुकी है. हवा के झोंके अब थप्पड़ जैसे पड़ रहे हैं.
“ये विंडो बंद कर दीजिये न प्लीज !” उस लड़के ने झट से खिड़की बंद कर दी . हवा अब भी परेशान कर रही है. हंसिनी आँखें मूंदे-मूंदे ही बार-बार अपने हाथों से चेहरे पर उड़ते बाल कानों के पीछे खोंस रही है. कोई हलचल हुई। कनखियों से देखा, वह लड़का उठ कर सामने वाले सीट की भी खिड़की बंद कर रहा है . हंसिनी को अब आराम आया. सीट पूरी पीछे कर के आँखों पर अँधेरा करने के लिए गोगल्स लगा कर नींद के घेरों में उतर जाने की प्रक्रिया में है वह। कल शाम जो एक उदासी से भरा गीत उसके मन में चल रहा था ‘सारे सपने कहीं खो गए...’ कहीं खो गया है . मन के रेडिओ पर फ़िलहाल ‘शाम गुलाबी, सहर गुलाबी, पहर गुलाबी, गुलाबी यह शहर है...धिन-चक धीन-चक धीन-चक...” वह बंद आँखों से अपने चेहरे पर एक मुस्कान महसूस कर रही है.
कंडक्टर पीछे की सीट की ओर गया है.
“अजमेर , एक” – एक आवाज .
“एक सौ दस रुपये,” – कंडक्टर का जवाब .
“अजमेर तक के कितने, भैया ?” रेट सुन कन्फर्म करती किसी और की आवाज.“ये वरिष्ठ नागरिक हैं न ! आपका प्रश्न सुनते ही समझ गया था.” कंडक्टर अनुभव के दंभ में बोला.
... वरिष्ठ नागरिक ? – हंसिनी ने झट आँखें खोल दीं . “आपने मुझसे भी तो एक सौ दस ही लिए !” वह कंडक्टर से कह तो बैठी मगर उत्तर आने से पहले ही कुछ सोच कर , “अच्छा-अच्छा , ठीक है ठीक है !” कह कर वह फिर से सीट पर टिक कर गोगल्स चढ़ा आँखें मूंद लेती है.
वह यह सोच कर खुश रहना चाहती है कि महिलाओं की टिकट रियायती दरों पर है !
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मुखर , 24/10/2018
Friday, August 9, 2019
“दरकते मूल्य” (कहानी )
“हर बात पर संदेह करती हो ! हर एक पर शक करती हो ! इतना अविश्वास क्यों ? आखिर फिर जियोगी कैसे ?”
दिलीप सही कह रहा है . यह बात मीनू मन ही मन भलीभांति जानती थी . आखिर चार पांच बरस हो गए थे दोनों की दोस्ती के . दोनों एक-दुसरे के रग-रग से वाकिफ़ थे. मगर मीनू करे भी तो क्या . बचपन ही से हर पड़ोसी , हर अंकल , हर भैया , हर पुरुष पर शक़ करने का जैसे पाठ ही सिखाया गया है .
“तुम भोली हो ! तुम्हें नहीं पता दुनिया कितनी धूर्त है , बेवकूफ़ बना लेते हैं तुम जैसों को . तुमने देखा ही क्या है अब तक ?” ऐसी ही बातें सुन-सुन कर उसने कभी किसी अंकल , टीचर को गुरु नहीं बनाया . कभी खुद पर भी पूरा भरोसा नहीं कर पाई . हमेशा बस एक ही बात जहन में उठती , “नहीं , मैं बेवकूफ़ नहीं बनूँगी !” इसीलिए कभी कोई बॉय फ्रेंड भी नहीं बना उसका. आज सत्ताईस की उम्र में भी ‘बेवकूफ़ न बन रही हो’ का डर उसे दिलीप पर भी जब-तब संदेह करने पर मजबूर कर देता .
यह तो किस्मत की ही बात थी और दिलीप की समझदारी भी कि उसने दोनों घरवालों को विश्वास में लिया था और आख़िरकार मीनू –दिलीप सात फेरों के बंधन में बंध सके.
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर दिलीप ने उसे लोगों पर ट्रस्ट करना सिखाया . जीवन अब अधिक सरल और खुशनुमा हो गया था . दुकानदार पर, दूधवाले पर, बाई पर , पड़ोसी पर , कुली पर , दोस्तों , जान पहचान वालों पर एक हद तक विश्वास करने लगी थी मीनू . और कभी दिक्कत भी नहीं आई . कभी कोई छोटी-मोटी परेशानी आई भी तो अपने पर बन आए आत्मविश्वास के कारण परिस्थितियों को संभल लेती थी . नतीजतन कई खूबसूरत रिश्तों से ज़िन्दगी संवर गई थी , महकने लगी थी . और समय ने पंख पसार लिए .
वह समय भी आया जब बड़ी बेटी को पूना के इंस्टिट्यूट में पढ़ने जाना था . चार लड़कियों ने मिल कर एक फ्लैट किराये पर ले लिया था . खुद दिलीप और मीनू सारी व्यवस्था ठीक कर आए थे .पहले-पहल तो करीब रोजाना ही बातचीत हो जाती थी . फिर वह पढ़ाई , प्रोजेक्ट्स में ऐसी व्यस्त हुई कि दो-चार दिन हो जाते थे फोन किये . वैसे भी चिंता-फिकर की तो कोई बात थी ही नहीं .
परसों शाम की बात है . ‘बार- बी – क्यु – नेशन’ में सुनील और दिव्या के शादी के सालगिरह की पार्टी चल रही थी. मीनू बुफे से सलाद लेने उठी ही थी कि सोहना का फोन आया . इधर उधर की दो चार बात कर उसने कहा , “मम्मा ! एक बात बतानी है आपको !” टोन में गंभीरता भांपते हुए मीनू प्लेट रख कर बालकनी में आ गई फोन सुनने . “हाँ ! अब बोल , अंदर लाऊड म्यूजिक है .”
“मम्मी !...”
“हाँ बेटा ss ?”
“चलो , घर पहुँच कर फोन कर लेना .”
“अरी बोल तो ! तुझे मालूम है, अब मेरा मन नहीं लगेगा .”
“ आज न ...आज जब मैं दिन को क्लास से लौटी ..”
“?”
“अपार्टमेंट के मेन गेट ही पर मेहरा अंकल मिल गए .”
“वही न जो थर्ड फ्लोर पर रहते हैं ? जब हम आए थे वे बंगलौर गए हुए थे अपने बेटे के पास ?”
“हाँ वही ! बातों बातों में उन्होंने मुझसे पूछा कि फ्लैट में मेरे साथ कौन-कौन है . मैंने बता दिया कि अभी तो मैं अकेली हूँ, शाम को पूनम आ जाएगी . बातें करते-करते हम लिफ्ट में गए . लिफ्ट में उन्होंने मेरे फेस पर टच किया और पूछा कि इतने एक्ने क्यों हो रहे हैं. मुझे तो कुछ समझ ही में नहीं आया कि क्या करूँ . मैंने नोटिस किया कि उन्होंने अपना फ्लोर भी मिस कर दिया और मेरे कंधे पर स्ट्रैप को छू कर पूछे कि यह क्या है . मैं तो जैसे ही मेरे फ्लोर पर लिफ्ट खुली फटाक से भाग कर फ्लैट में घुस गई और अन्दर से दरवाजा बंद कर लिया . मुझे बहुत अजीब सा लग रहा था . मम्मी , पता नहीं क्यों मेरा दिमाग एकदम से सुन्न हो गया था . रिएक्ट ही नहीं कर पाई . मुझे तो लग रहा था कि हमारे अपार्टमेंट के अंकल हैं . सोचा भी नहीं था ...”
सोहना बोली जा रही थी और मीनू का चेहरा अवाक खुला रह गया था .
“मम्मा ! बोलो न आप कुछ !..”
“बेटा तू घबरा मत ! हम कल ही पहुँच रहे हैं वहां . उस बुढ्ढे को तो हम बताएँगे. तू दरवाजा अच्छे से बंद रखना. और सुबह रोजाना के जैसे कॉलेज जाना. किसी से कुछ कहने या डरने की कोई जरुरत नहीं है .मगर आज के बाद किसी पर भी विश्वास नहीं करना . यह दुनिया विश्वास करने लायक ही नहीं है दरअसल . उस साले बुढ्ढे के बच्चे भी तुझसे बड़े हैं . फिर भी लाज शर्म नहीं !...”
फोन रखने के बाद, पार्टी से लौटते हुए रास्ते भर , अगले दिन कैब से पूना के लिए रवाना हो रस्ते भर मीनू के जबान पर बार-बार एक ही वाक्य लौट-लौट कर आ रहा था , “कोई भी तो भरोसे के लायक नहीं इस दुनिया में !”
दिलीप क्या कहता ? समझ रहा था कि विश्वास ज़माने में ज़िन्दगी लगी और टूटने में पल भर !
- - (अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की स्मारिका 'हमारा दृष्टिकोण' में प्रकाशित)

Wednesday, July 24, 2019
"दौलत" - कहानी
Friday, April 19, 2019
“ आसमां से जमीं की मुलाकात ”
सारी तैयारियां भी हम ही को करनी थी , सो समय से पहले नहीं ,
ठीक समय पर हम पहुंचें एयरपोर्ट पर उनको लेने लेने . अठासी वर्षीय सोशल एक्टिविस्ट
व् नामचीन लेखिका रमणिका गुप्ता जी पिछले दिनों की बीमारी से कुछ कमजोर हो चली थीं
. व्हील चेयर से खड़ी हो कार में बैठने में दिक्कत हो रही थी . राजस्थान लेखिका
साहित्य संस्थान की अध्यक्ष वीणा चौहान जी और रेशमा (एक्टिविस्ट की सहायिका) ने
उन्हें बाहर से मदद की और मैंने अपना हाथ बढाया . उनका सीट बेल्ट लगाया .
“ओह्ह !” हमारे मुँह से बेसाख्ता निकल गया . फिर भी हमारे संस्थान के
वार्षिकोत्सव में आप आए इस बात का बहुत बहुत आभार व्यक्त किया वीना माम ने . रमणिका गुप्ता (जन्म- 22 अप्रैल 1930 सुनाम, पंजाब) हिन्दी की आधुनिक महिला साहित्यकारों में से एक हैं। साहित्य , सियासत और समाज सेवा, इन तीनों ही क्षेत्रों में उन्होंने समान रूप से सक्रिय रहकर प्रसिद्धि प्राप्त की है। उनका कर्मक्षेत्र बिहार और झारखण्ड रहा है। रमणिका जी की लेखनी में आदिवासी और दलित महिलाओं, बच्चों की चिंता उभर कर सामने आती है।
उन्होंने
थोड़ी थोड़ी सभी सब्जियाँ , दाल , फल मिक्स सलाद , पापड़ , रायता , कस्टर्ड आदि खाया
. रात के खाने में वे रोटी व् चावल नहीं खातीं . सब्जयों में उन्हें राजस्थानी
स्वाद बहुत भाया. गूँदे की सब्जी और जोधपुर की खास गुलाब जामुन की सब्जी . एक
पुलिस अधिकारी को उनके जयपुर आने की ख़बर लग गई थी सो वे अपने घर से कैरी की लूंजी
लाये थे उनके लिए . वीना माम जिस प्रकार से उनके पास बैठ प्रेम से एक एक चीज उनको
खिला रहीं थी , बहुत प्यारा दृश्य था वह.
दो
सत्रों के कार्यक्रम पश्चात् खाना खा कर हम वापस गेस्ट हाउस लौटे , थोडा विश्राम
किया. मैं उनके लिए एक छोटा सा उपहार ले गई थी जो उन्होंने सहर्ष स्वीकारा. उन्हें
एअरपोर्ट पर विदा करते हुए पिछले चौबीस घंटों की अहमियत महसूस हुई और खुद के भाग्य
पर गर्व हुआ कि देश की नामचीन हस्ती तथा जमीं से जुड़े मुद्दों पर इतना काम करतीं
इतनी अनुभवी , वयोवृद्ध हस्ती का साथ मिला. उन्होंने जाते हुए वीना माम और मुझे
झारखण्ड में होने वाले साहित्यिक कार्यक्रमों के लिए निमंत्रित किया. बहुत सा
उत्साह , बहुत सी उर्जा , बहुत सी सकारात्मकता मेरी कार में भर गई थी ... या मेरे अन्दर ? शायद सब ही जगह !

