Wednesday, March 27, 2019

"परिवार एवं समाज में हक और आज़ादी मिले " - लेख


सारी दुनिया सत्ता और सम्पत्ति के पीछे ही चलायमान है यह एक सर्विदित तथ्य है. इतिहास गवाह है कि सिंहासन के लिए बाप बेटे, भाई भाई में मार काट तक मची, जायदाद के बंटवारे में हत्याएँ हुई। आज भी होती हैं।
एक किशोर होती लड़की के कोमल अहसासों के साथ साथ यह सच्चाई का भी ज्ञात होता है कि उसका घर, आंगन, व्यवसाय, सम्पत्ति पर उसने पैदा होते ही अधिकार खो दिए थे क्यूँकि वह लड़की है, और इसीलिए पैदा होते ही उसका भाई सब चीज का वारिस हो गया! वह तो पराया-धन है। और तो और वह आत्म निर्भर भी नहीं हो सकती। उसके सारे अधिकार उसके सपनों के राजकुमार से शुरू होते हैं। तो फिर वह पति के घर में आ कर भी सब कुछ क्यूँ बाटें? किससे बाटें? वहाँ भी वह पराई क्यूँ है? ससुराल में भी जहाँ हर पुरुष - बाप, बेटा, भाई आदि खून के रिश्तों से बँधे हैं तो हर औरत - माँ, बेटी, बहू या तो पराए घर से आई हैं या पराये घर को जानी हैं। उनका आपस में समाज का बनाया रिश्ता ही तो है? फ़िर वे आपस में उन थोड़े से अधिकारों के लिए लड़ बैठती हैं, एक दूसरे को अधीनस्थ करने को लालयत हो उठती हैं तो यह बहुत ही स्वाभाविक है! यह जुमला कि ‘महिलाएँ ही महिलाओं की दुश्मन है पुरुषों का फेंका हुआ है ताकि वे पितृ सत्ता के कुप्रभाओं के आरोप से साफ़ बच निकलें। वे बस आराम से बैठ कर हथाई करें, अख़बार पढ़ें, टी वी देखें और चाय पकौड़ों का ऑर्डर मारें! घर परिवार में महिलाओं के बीच में वह सूत्र ही ऎसा बैठाया गया है कि उनमें यह विश्वास बैठाना आसान था कि महिलाएँ ही महिलाओं की दुश्मन है।
सौतन, सौतेली माँ, बाँझ, विधवा जैसे धारणाओं को भी देखेंगे तो सब समाज प्रदत्त हैं। बचपन से परवरिश के भेदभाव के कारण कमजोर देह की महिला जब साधारण से भी इलाज के अभाव में या अधिकांशत: जापे में मर जाती थी तो अपने बच्चों को पालने की जिम्मेदारी स्वयं उठाने के बजाए एक कमसिन लड़की के सपनों को चूरचूर कर ब्याह लाता और यह आशा कि वह उन बच्चों को अतिशय प्रेम से पाले? एक महिला के लिए पराए गाँव - देश घर में अपने बच्चों के अ
लावा खून का रिश्ता होता ही क्या है? वे भी वह पराए पाले? और उस पर भी रिपोर्ट कार्ड देने वाले ससुराल वाले ही?
अभी कल ही के एक नामचीन अख़बार की रिपोर्ट है कि बांग्लादेश में पिछले साथ सालों में तलाक की दर 34% बढ़ी, वह भी महिलाओं द्वारा दायर की जाने के कारण! वजह? नौकरी! महिलाएँ जब आत्म निर्भर होती हैं तो सोचने समझने का नजरिया विकसित होता है… अब तलाक उन्हें पहले जितना चुनौतीपूर्ण नहीं लगता। बराबरी हो, साझेदारी हो… जहाँ पति स्वामी न हो और ससुराल अपना घर हो जहाँ किसी हॉस्टल के कायदे न हो, जहाँ महिला अपनी. मर्जी से दो पल सुकूं के गुजार सके। मग़र सास और ससुराल का भय जहाँ दिखा कर लड़की को शुरू से ही ‘सामंजस्य’ बैठा कर चलने की सीख मिली हो तो युगों से सदियों से रची बसी असुरक्षा की भावना में यही होगा।
समाज की विचारधारा में आमूलचूल परिवर्तन किए जाएँ तो महिला ही महिला की सबसे बड़ी हिमायती होती है! वरना सत्ता - संपत्ति में होड़ और दुश्मनी कोई लैंगिक भेद नहीं रखती।
-       मुखर कविता, (कथाकार, विचारक)

Monday, January 7, 2019

"नया डर" - लघुकथा


जच्चा बच्चा वार्ड में सुशीला को आज तीसरा दिन था. उसके नवजात बेटे को स्वांस नली में कोई समस्या आ गई
थी जिसे लेकर घरवाले गुर्जर की थडी, जे.के. लोन अस्पताल ले कर गए थे. सुशीला को अपने तन के दर्द की सुध
ही नहीं थी , वह तो मन से ही उखड़ी हुई थी . पहले भी उसका एक बेटा किसी जन्मजात जटिलता की वजह से
चार महीने का होने से पहले ही गुजर गया था. फिर उसने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया. वह चार बरस की है.
सुशीला अब और संतान पैदा नहीं करना चाहती थी. मगर ईश्वर ने कोख़ भले ही उसे दी थी मगर उसकी कोख पर
अधिकार तो ससुराल वालों का था.
“एक अकेली संतान का क्या जीवन ? अपने बुढ़ापे के लिए नहीं तो बच्ची के तरफ तो देखो ! दो संतान तो होनी
ही चाहिए !”
समाज भी जैसे ससुराल वालों की ही रोटी खाता हो, उस पर बराबर दबाव बनाये हुए था. घर में तो घर में , घर
से बाहर भी किसी तरह चैन नहीं था. वार- त्यौहार तो जैसे मुसीबत ही बन कर देहलीज चढ़ते. पतिदेव तो पहले ही
समर्पण किये बैठे थे. आख़िरकार उसने भी हाथ ऊपर कर दिए. उसने अपना काम कर दिया था, बच्चे को जन्म दे
दिया था. ख़ुशी की बात यह थी कि बेटा हुआ था ! एक बेटा, एक बेटी, परिवार पूरा ! वह खुश थी तो पति एवं
परिवार वालों की ख़ुशी का तो जैसे ठिकाना ही नहीं था. परन्तु कल रात ही से शिशु की तबियत नासाज थी. आज
तो उसे बच्चों के बड़े डॉक्टर को दिखाने जे.के.लोन ले जाना पड़ा. वह बिस्तर पर अधमरी सी पड़ी है ! बोली नहीं
फूट रही है मुंह से परन्तु उसका मन हाहाकार कर रहा है “हे प्रभु ! बेटा दिया है चाहे बेटी देता , पर स्वस्थ तो
देता ! सब ठीक कर दो भगवन ! नौ महीने पेट में रखने के बाद कैसे मोह छुड़ाया जाए ? पिछला घाव भी लिए
बैठी हूँ दिल में ! अबकी नहीं !”
नन्दिनी भाभी आई है . सुशीला की सास को तीन दिन हो गए हैं बहु के साथ अस्पताल में. शाहपुरा से सुशीला,
उसके पति और सास आये हैं उसका प्रसव कराने. यहाँ जयपुर में सुशीला के भैया- भाभी रहते हैं , ग्लोबल
हॉस्पिटल के पास ही.
“काकी जी ! छोरा को जब तक दूसरे अस्पताल ले गए हैं आप घर चल के नहा धो लो. तीन दिन हो गए आपको.
यहीं गाँधी पथ पर डेढ़ किमी ही पर है घर. काम धाम निपटा कर ज्यादा से ज्यादा दो घंटे में वापस आ जायेंगे.”
बगल वाले बिस्तर पर की जच्चा को नजर रखने को कह भाभी और सास चले गए. सुशीला ने देखा बगल वाली
महिला खुद नहा कर आई थी और चोटी बना कुर्ती-कांचली बदल एकदम स्वस्थ लग रही है . वह अपने नवजात को
दूध पिला अभी बस सुला ही रही है . उसका पति अभी-अभी निकला है अस्पताल से ऑफिस जाने को. सुशीला को
अपनी तरफ देखती वह महिला देख लेती है और मुस्कुराती है. फिर धीरे से कहती है,
“आज शाम छुट्टी मिल जाएगी मुझे ! पाँच दिन हो गए न !” दो पल को मन ही मन मुदित हो बोली, “मुझे भी
बेटा हुआ है !” उसके चेहरे पर चमक थी और बेहद खुबसूरत मुस्कान.
“बेटा हो या बेटी, बच्चा स्वस्थ हो तो सब अच्छा !” सुशीला की आवाज में और बात में दर्द था.

“अरी काहे का अच्छा !” वह महिला कोई मर्म की बात कहती प्रतीत हुई , “पहले ही दो बेटियां है मेरी ! अगर
अबकी भी छोरी हो जाती तो मुझे फिर चौथी बार उसी नरक से गुज़रना पड़ता ! इब तो हाथ की हाथ ऑपरेशन
करा लिया !”
सुशीला की आँखें फटी की फटी रह गईं ! वह अभी तक अपने ही भय से घबराई हुई थी . इस नए डर का वह कैसे सामना करेगी ? ससुराल वालों की पिछली जिद्द , समाज वालों का सारा व्यवहार और इन सबके आगे उसके पति
का झुकता व्यक्तित्व उसकी आँखों के आगे घूम गया और अगले ही पल अंधकार छा गया !
* * *