Monday, January 7, 2019

"नया डर" - लघुकथा


जच्चा बच्चा वार्ड में सुशीला को आज तीसरा दिन था. उसके नवजात बेटे को स्वांस नली में कोई समस्या आ गई
थी जिसे लेकर घरवाले गुर्जर की थडी, जे.के. लोन अस्पताल ले कर गए थे. सुशीला को अपने तन के दर्द की सुध
ही नहीं थी , वह तो मन से ही उखड़ी हुई थी . पहले भी उसका एक बेटा किसी जन्मजात जटिलता की वजह से
चार महीने का होने से पहले ही गुजर गया था. फिर उसने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया. वह चार बरस की है.
सुशीला अब और संतान पैदा नहीं करना चाहती थी. मगर ईश्वर ने कोख़ भले ही उसे दी थी मगर उसकी कोख पर
अधिकार तो ससुराल वालों का था.
“एक अकेली संतान का क्या जीवन ? अपने बुढ़ापे के लिए नहीं तो बच्ची के तरफ तो देखो ! दो संतान तो होनी
ही चाहिए !”
समाज भी जैसे ससुराल वालों की ही रोटी खाता हो, उस पर बराबर दबाव बनाये हुए था. घर में तो घर में , घर
से बाहर भी किसी तरह चैन नहीं था. वार- त्यौहार तो जैसे मुसीबत ही बन कर देहलीज चढ़ते. पतिदेव तो पहले ही
समर्पण किये बैठे थे. आख़िरकार उसने भी हाथ ऊपर कर दिए. उसने अपना काम कर दिया था, बच्चे को जन्म दे
दिया था. ख़ुशी की बात यह थी कि बेटा हुआ था ! एक बेटा, एक बेटी, परिवार पूरा ! वह खुश थी तो पति एवं
परिवार वालों की ख़ुशी का तो जैसे ठिकाना ही नहीं था. परन्तु कल रात ही से शिशु की तबियत नासाज थी. आज
तो उसे बच्चों के बड़े डॉक्टर को दिखाने जे.के.लोन ले जाना पड़ा. वह बिस्तर पर अधमरी सी पड़ी है ! बोली नहीं
फूट रही है मुंह से परन्तु उसका मन हाहाकार कर रहा है “हे प्रभु ! बेटा दिया है चाहे बेटी देता , पर स्वस्थ तो
देता ! सब ठीक कर दो भगवन ! नौ महीने पेट में रखने के बाद कैसे मोह छुड़ाया जाए ? पिछला घाव भी लिए
बैठी हूँ दिल में ! अबकी नहीं !”
नन्दिनी भाभी आई है . सुशीला की सास को तीन दिन हो गए हैं बहु के साथ अस्पताल में. शाहपुरा से सुशीला,
उसके पति और सास आये हैं उसका प्रसव कराने. यहाँ जयपुर में सुशीला के भैया- भाभी रहते हैं , ग्लोबल
हॉस्पिटल के पास ही.
“काकी जी ! छोरा को जब तक दूसरे अस्पताल ले गए हैं आप घर चल के नहा धो लो. तीन दिन हो गए आपको.
यहीं गाँधी पथ पर डेढ़ किमी ही पर है घर. काम धाम निपटा कर ज्यादा से ज्यादा दो घंटे में वापस आ जायेंगे.”
बगल वाले बिस्तर पर की जच्चा को नजर रखने को कह भाभी और सास चले गए. सुशीला ने देखा बगल वाली
महिला खुद नहा कर आई थी और चोटी बना कुर्ती-कांचली बदल एकदम स्वस्थ लग रही है . वह अपने नवजात को
दूध पिला अभी बस सुला ही रही है . उसका पति अभी-अभी निकला है अस्पताल से ऑफिस जाने को. सुशीला को
अपनी तरफ देखती वह महिला देख लेती है और मुस्कुराती है. फिर धीरे से कहती है,
“आज शाम छुट्टी मिल जाएगी मुझे ! पाँच दिन हो गए न !” दो पल को मन ही मन मुदित हो बोली, “मुझे भी
बेटा हुआ है !” उसके चेहरे पर चमक थी और बेहद खुबसूरत मुस्कान.
“बेटा हो या बेटी, बच्चा स्वस्थ हो तो सब अच्छा !” सुशीला की आवाज में और बात में दर्द था.

“अरी काहे का अच्छा !” वह महिला कोई मर्म की बात कहती प्रतीत हुई , “पहले ही दो बेटियां है मेरी ! अगर
अबकी भी छोरी हो जाती तो मुझे फिर चौथी बार उसी नरक से गुज़रना पड़ता ! इब तो हाथ की हाथ ऑपरेशन
करा लिया !”
सुशीला की आँखें फटी की फटी रह गईं ! वह अभी तक अपने ही भय से घबराई हुई थी . इस नए डर का वह कैसे सामना करेगी ? ससुराल वालों की पिछली जिद्द , समाज वालों का सारा व्यवहार और इन सबके आगे उसके पति
का झुकता व्यक्तित्व उसकी आँखों के आगे घूम गया और अगले ही पल अंधकार छा गया !
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