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Wednesday, August 6, 2014

' फिसलन '

मैने पत्तों के माफिक,
फैला दी थी अपनी हथेलियाँ,
बरसते बादलों को,
अपनी मुठ्ठी में ,
कैद करने की कोशिश करती !
हथेली पर सरसों जमाना सा एक खेल !
मगर,
मगर मेरे हाथ ही नहीं,
मैं भी धुलि धुलि सी लगने लगी.

गिरती थी बूंदे, और उठते थे प्रश्न् 
जाने कहाँ से तो, आती हैं ये बदरियाँ,
जाने क्यों तो बरसता है सावन ?

मौसम सुहाना सा हो रहा था।..
मैं कब टिकने वाली थी अपनी अटरिया पे ?
निकल पड़ी थी जानी अनजानी सी राहों पर...

जाने मैं चल रही थी या
मेरा मन ही भाग रहा था या
मन में विचार दौड़ लगा रहे थे,
सब कुछ ठहरा ठहरा सा,
मगर जब तब कौंधती बिजली सा तेज...

जाने फिसलन भरी थी डगर,या 
विचार ही रेशमी हो चले थे या 
फिर मेरी हथेलियाँ ही भीगी भीगी सी...
कि कुछ तो हाथ ही नहीं लगा !

मन के खाली कटोरे और
पसरी हुई हथेलियाँ उठा कर 
मैं वहीं चली आई, अपनी अटरिया पर !

आईने में चमकती दो आँखे
मुझे बता रही थी,
बता रही थी या
समझा रही थी,या
साक्षात दिखाती सी ...
कि क्यों बरसते हैं सावन और भादो ! 
                                          - mukhar !
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