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Tuesday, July 23, 2013

इश्क करूं या करूं इबादत ...

जाने क्या था वहां...की कुछ भी नहीं था या ...सब कुछ ही था...
देर तक दूर तक शुन्य में निहारती मेरी आँखें आखिरकार मैं बंद कर लेता हूँ. तो उतनी ही दूर से जाने कैसे तुम वहाँ भी कहीं आ धमकती हो !
मैं सिर्फ हल्का सा मुस्कुरा भर देता हूँ. तुम नहीं जानोगी, पर पता है ? तुम मुझे दिखाई नहीं देती हो ! सुनाई भी नहीं ! बस बातें ही हैं- मेरी और तुम्हारी. आजकल मैं दिनभर बतियाते रहता हूँ. मगर अपने आपसे नहीं, तुमसे ! कोई शक्ल नहीं कोई आवाज नहीं...बस एक बड़ा सा शून्या !
अच्छा , एक बात बताओ - प्रेम इश्वर है ? या इश्वर प्रेम है ? या फिर दोनों बातों का एक ही अर्थ है ? ...मैं...तुम...प्रेम...इश्वर ...शुन्य...एक बड़ा सा शुन्य...उफ्फ !!
मैं आँखे खोल देता हूँ. फिर चली गयी तुम ? तुम कहीं नहीं जा सकती ! क्योंकि सब बातें हैं...कोरी बातें . कभी किसी ने देखा है इश्वर ? कभी किसी ने पाया है पूर्ण प्रेम ? कभी किसी ने समझा है 'मैं' ? फिर तुम ?
रहने दो . ये सब शुन्य है ! एक बड़ा सा शुन्य !
उठो ! दिन शुरू करो ! जिंदगी कब बसर हुई यूँ प्रेम के सहारे ? भगवान् के भरोसे ? या मैं और तुम से ?
मगर... मगर इनके बगैर क्या जिंदगी खुद एक शुन्य नहीं रह जाएगी ?
                                                                                         :- मुखर
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