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Friday, February 22, 2013


 " का्य पो चे..."
वो क्या कहते हैं ऐसी सोच को ? फमिनिस्ट ? अब मान भी ले तू फेमिनिस्ट है.
ठीक है जी मान . मगर बता मैं इस बार गलत हूँ क्या ? ये कैसा को इंसिडेंट है यार ?
जब 'दिल चाहता है' मूवी देख कर लौटी थी झट से मेरे पसंदीदा मूवीज में शामिल कर लिया था इसको. टी वि पर जब भी मौका मिला जरूर देखा. दोस्ती ऐसी होती है.
फिर 'रंग दे बसंती ' और 'थ्री इडियट्स ' देखि तो मान गए आमिर को. हमेशा से अछे सब्जेक्ट्स ले कर आता है. अलग ही अंदाजे बयां है उसका. मूवी का असर ये था की दोस्तों के सर्कल्स में नया जोश भर गया था, देश- दुनिया बदल देने का.
जब 'जिंदगी न मिलेगी दोबारा ' देखि, हाँ, अच्छी थी मगर दिल के किसी कोने में बैठी तीस उभरने लगी. एक बात तो है, दोस्ती लड़कों ही की निभ सकती है. हमारी दोस्ती चाहे ज्यादा गहरी और पक्की हो, शादी नाम की व्यवस्था की भेंट चढ़ जाती है. ऐसा नहीं  की बिलकुल ही ख़त्म हो जाती है मगर फिर भी...
मेरे मन को जितना मैं जानती हूँ उससे ज्यादा ये जानते हैं. फिर क्या था / उस गर्मी की छुट्टियों में मेरी दो सहेलियां अपने बच्चों समेत यहाँ मेरे घर जयपुर ! प्लान था दो दिनों का जो सात दिन का हो गया. भाई, मजा आ गया लाइफ का !
इस बार भी तो जब ममता शिमला से आई, इन्होने कैसे भी मेनेज करके मुझे जोधपुर ले जाना, लाना किया था. अंजू, ममता और मैं...जिंदगी बहुत बदल गयी है मगर जब हम तीनो मिलते है तो वो हमेशा खूबसूरत ही दिखती है ! खूब साडी बातें, इमोशंस और कहकहे !
रिव्यू पढ़ा है  'का्य पो चे ' का. चेतन भगत की नोवेल 'थ्री मिस्टेक्स ऑफ़ माय लाइफ' पर बेस्ड है. मगर ये मूवी भी लड़कों की दोस्ती पर बेस्ड है. मेरी फेमिनिस्ट एटीटउड ऐसी बातों को जरा जल्दी भांप लेती है या आप लोगों को भी लगा ऐसा ? बताना मुझे, नहीं तो मुझे लगेगा कि ...
कोई नहीं, हम तो न्जोय करेंगे इस मूवी को भी क्योंकि दोस्ती को हम तो जीते हैं !
मगर कोई चेतन भगत ! कोई आमिर ! कोई सुन रहा है ? जरा अपनी नज़र सोसायटी पर चौतरफा घुमाव ! दोस्ती का एक खूबसूरत रंग तुम्हारी कलम से कमरे से छूट तो नहीं रहा ?
का्य पो चे !!!
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