Thursday, June 5, 2014

' सोचो जरा ... '


तीन बजने को थे. उसके आने का समय हो रहा था. मगर आज मुझे तसल्ली थी. बेचैनी नहीं. घर के बगल में साढ़े तीन फीट चौड़े गलियारे में मैंने पूरे सड़क तक कोई पूरे अठ्ठारह गमले लगाये थे. तरह तरह की पत्तियों वाले कई तरह के पौधे. जीवन की चंद खुशियों में से ये एक थे . मगर..
मगर पिछले १५-२० दिनों में एक एक कर लगभग सारे ही जल गए. मैं कोई आसानी से हार मानने वालों में से कब थी. हर शाम एक एक पत्ती को नहला कर तरो ताजा करती. मगर दिन चढ़ते चढ़ते सारे के सारे निढाल से हो जाते. दिन दिन दुबले होते एक एक कर दम तोड़ते गए.
खिड़की पर पड़े मोटे पर्दों से आती झुलसन उसके आने की खबर दे रही थी. अपने क्रूर किरणों से वो उस आखिरी पौधे को ढूँढ रहा था जिसकी सांस कल भी बाकी रह गयी थी.
करीब डेढ़ घंटे बाद मैंने बालकनी का दरवाजा खोला तो मुझे मुस्काता देख वो कुढ़ सा गया.
क्या बात है, पीले पड़ गए ?
हाँ, आज का काम बड़ा थकाने वाला था...
सॉरी ! मैंने वो पौधा बड़े गमले की आड़ में रख दिया, तुम्हारी किरने वहाँ नहीं पहुन्चेंगी .
ओह्ह !
अच्छा एक बात बताओ , तुम्हारा नाम दिनकर है या दिवाकर ?
हहहाहा ! क्या फर्क पड़ता है, तुम तो मेरा तेज देखो !
हाँ, सो तो है ! मगर पर्यावरण भी तो कुछ चीज है ! सब ही जला कर राख कर दोगे तो हम तो हरियाली ही को...
एक्सक्यूज मी ? बड़ी सेल्फिश हो ! तुमने तो पर्यावरण अपने घर तक सिमित कर लिया ? हाँ ?
घर तक नहीं, पृथ्वी...
हाँ हाँ, एक ही बात है ! मैं तुम्हारे अकेले की बात नहीं कर रहा. मगर फिर मेरा क्या? मैं इस जगत का हिस्सा नहीं ?
हो तो , किसने मना किया ?
तो फिर हरियाली के ख़ाक होने का तोहमत मुझपे क्यों ?
एक्चुअली ...मुझे मेरे पौधे बड़े अच्छे लगते हैं. सुंदर लगते हैं. बड़ी मेहनत से साल भर में उन्हें हरा भरा करती हूँ कि गर्मी आते ही तुम सब जला डालते हो !
तो यों कहो न ! चोट तुम्हारे दिल पर लगती है और चलाने लगती हो दिमाग ? ये लडकियां भी न, बस ! अब क्या हुआ?
कुछ नहीं !
तो ये चेहरा क्यों लटका हुआ है ? दिन को तरबूज खाया नहीं क्या ?
खाया न ! तरबूज खरबूज तो मुझे बहुत पसंद हैं.
मालूम है मुझे ! और हाँ डिनर में आमरस जरूर बनाना !
तुम्हे क्या ? बोल तो ऐसे रहे हो जैसे तुम्हे इनवाइट किआ है मैंने !
अरे नहीं रे ! मैं तो तुम्हे ग्रीष्म ऋतू की और मेरी महता समझा रहा था . सोचा समझदार को इशारा काफी है ! मगर तुम तो...
ठीक है ठीक है ! मुझे बुध्दू मत कहना, कहे देती हूँ !
तो सुन लो मेरी बात. सुन भी लो गाँठ भी मार लो. ये पर्यावरण के नुक्सान, ये उजडती हरियाली, ये चिलचिलाती धूप , ये पानी के लिए किल्लत...इन सबके लिए मैं नहीं तुम जिम्मेदार हो ! तुम मतलब अब सिर्फ तुम नहीं !
मैं तो जीवनदाता हूँ !
सही कहते हो !

                                      --मुखर !

Friday, May 30, 2014

https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhWVwZsvytRm4a8O_LplXVkVQ5rmyCpD-H9HLtk-NUF3u60gUwdq3y4eW7vFTEhxbrUbaSJE-WOn_24ExlR7bVYxLLVDz1dL9rtmcja5oFRwHDhIgpuMxGbIVGYgPpTZrmLZ9qrsV1Qj77u/s1600/garden+037.jpgये उलझन !
वह उड़ तो सकता था,
वह उड़ भी तो रहा था,                                     
मगर उसकी उड़ान की जद
पंजे में बंधी एक डोर थी.
कच्चे धागों से ये नाजुक बंधन.
इस घेरे के अंदर की जमीन पर,
ये जो कुछ धब्बे से दीखते हैं...
वक़्त की गर्द से ढके छिपे ,
कुछ जख्म हैं,
पंछी के नाजुक पंजो पर भी...
जख्मी तन...छलनी मन  !
नहीं ! इसके परे देखने के लिए,
मेरे तुम्हारे पास नजर नहीं.
तुम तो बस उसकी उड़ान देखो,
क्योंकि वो उड़ तो सकता था,
वह उड़ भी तो रहा था...
कच्चे धागों के ये नाजुक बंधन !!
यदा-कदा फड़फड़ाहट सी जो
सुनाई देती हैं न !
भीतर से आती कोई आवाज है...
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiJUbxOePM1zrQKSnYsdzJru6z2lSqKgEgkI3zpecqkJnDglmgIvOwyr-v5QAiUFcmCz1WOQAdlRI-EBTVxuy13bM-sURgEbwVihBeV-H48K61X8M5jxSZqW7qgFe2rQYG_KTCJWAWgtag/s1600/il_430xn13737421.jpgजैसे पर है तो परवाज है !
वह खुला आसमान मुझे, या
मैं खुले आसमान को ताकता हूँ !
बेजुबान परिंदों की आँखों में, या
जिंदगी के गिरेबान में झांकता हूँ !
तार -तार सा कुछ...
क्या कोई ख्वाब था ?
बड़ी रंगीन सी ये उलझन !!
कच्चे धागों से ये नाजुक बंधन !
तभी तो, देखो, वह उड़ रहा है .
क्योंकि वो उड़ तो सकता है.
मगर उसकी उड़ान की जद
पंजे में बंधी डोर है !
पहचाना ?
अब तुम पूछोगे -
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgoyZ17bH5WzhND8y7-rl0PFP6E_JXrfvJ0qxboPjbOCN5sePKlqVN44Bzz5gMgK376bxoMpCD1I9PrYqx8nf5xVYjz45Gli46LIUF8Rz6nQHB622cV63A93TdfEhgstfXUKecWVEKm_ZY/s1600/threadingbirdthroughcage.JPGक्या ? उड़ान, जख्म या डोर ?
अरे बुध्धू ! वो पंछी !
हहहहाहाssssss..
---------------मुखर !!



Friday, May 16, 2014

आशंकाएं ( Preconceived Notions ) :-

Is that a good thing? or is it a terrible thing ?
Anyways ,
देश का सवाल है, ऊंगली तो उठाना पड़ेगा, नेताओं को बताना पड़ेगा, जनता को कोन्फीडेंस में लेना पड़ेगा !! तो, पेश है :-
आशंकाएं :-
अब हम अमेरिका हो जायेंगे, इंग्लैंड हो जाएँगे !
यह जानने की हसरतभर है मुखर -
क्या हम भारत- भारतीय रह पाएंगे ?
अख़बार, टी वी सब मीडिया उनके ही गुण गायेंगे,
आज तो जी भर कर बोल लेने दो हमको,
कल ये हम सबकी बोलती बंद कर जायेंगे !
( आजकल हम स्टार-प्लस पर महाभारत देख रहे हैं )
हर संकट, भीषण अत्याचार, दुःख, अपमान भी,
धर्मराज को धर्म से न डिगा पाए ,
सुबह ( शक) हमको है ऐ मुखर -
क्या हम धर्म-निरपेक्ष रह पाएंगे ?
कहीं ऐसा न हो, आम आदमी बसदौलतमंद, सत्तानासीन, कोरपोरेट के,
पांव दबायेंगे, जी हुजूरी बजायेंगे !
तसलीमा, रुश्दी, हुसैन तो नहीं 'पढ़' पाते यारों ,
डर है क्या अब हम ऍफ़ बी पर भी,
कुछ अच्छा, कुछ मन का पढ़ पाएंगे ?
                                   - मुखर !

Saturday, May 10, 2014

लहरों की तरह यादें...
जाली का दरवाजा लगा छनती हवा और चौकोर बिछावन सी धुप में जब मटर छिलने बैठी, मेरी उंगलियों पर थोड़ी झुर्रियां उभर आयीं. मेरे बॉब कट बाल कमर तक गुंथी हुई चोटी हो गए. और कहीं से आकर मेरी कमर में साड़ी का पल्लू खुस गया. मैंने देखा केप्री नहीं साड़ी की चुन्नटों के बीच दीखते मेरे पैरों में चांदी की बिछिया पाजेब थी !
" बिट्टू sss...!"
" हाँ s s ss ! " कितने बरसों बाद किसी ने मुझे आवाज दी थी इस नाम से...!
" मम्मा ! कितने नाम निकालोगी मेरा ? मैं किट्टू हूँ , किट्टू ! बिट्टू मत बोला करो मुझे !"

देखा तो धुप का टुकडा कहीं नहीं था . ...और ना ही...
फिर वो  - ? मैं ?

" अच्छा ! जा, एक गिलास पानी ला दे ! "
" अभी तो पि ..."

" हाँ, एक और ला दे बीटा. बड़े जोरों की प्यास लगी है " अब मैं उससे क्या कहती ? कि आवाज मैंने नहीं दी  थी ? ऐसे तो कभी मेरी मम्मी मुझे आवाज दिया करती थी !
                                                                          - मुखर !

Tuesday, March 25, 2014

ऍफ़ बी चुनाव ( चॉइस )

25 March 2014 at 19:02
लोकसभा चुनाव में चार सीटें
इस बार फेसबुक से भी हैं ,
             - उन्होंने बताया !
हमने 'भैये क्या कै रिये हो ' अंदाज में
भौंवें उठाया और फ़रमाया -
फेसबुक पे जो भी आया ,
थोड़े दिनों तो
'फोटो-र-मोटर ' का रंग जमाया ,
नए पुराने, खोये पाए दोस्तों को
             खूब गले लगाया...
फिर पतली गली से सटक लिए !

अब जो थोड़े बहुत बचे हैं
उनके पास थोडा सा तो दिल है
और (या) थोडा दिमाग भी...
इन एक्टि -विस्टों , साहित्य-कारों
या फिर उनके चाटू- कारों..
आदि आदि इत्यादियों को ही कब
'साम - दाम - 'वाम ' तरीका भाया ?

गोदाम भर भर पैसा कमाएंगे ...
जी भर भर देश का बाजा बजायेंगे...
कभी इस दल तो कभी उसमें जायेंगे ...
क्या हुआ जो न घर का न घाट का कहायेंगे ...

हे प्रभु ! कमसेकम इस वर्चुअल वर्ल्ड को तो
इस राज - नीति से बचाओssss
भैये जाओ ! इस हमाम में तुम ही नहाओ !!
                         
    मुखर 

Saturday, March 8, 2014

 " सहगामिनी "
*************
टटोल लेती हूँ मैं -
कभी राखी,
तो कभी मंगलसूत्र .
भर लेती हूँ अपने हाथ
कभी मेहंदी महिला दिवस पर -
कभी रंगोली
तो कभी सिंदूर !
सहला लेती हूँ
मेरा आज, मेरा कल,
तो कभी पेट में पड़ा एक बल !

बस हाथ लगते ही
टीस सी उठती है
ये सब- कैसे कब
मेरे हाथ लगे ?
मैंने चाह था ?
मैंने माँगा था ?
मैंने तो कोई राह
कभी चुनी ही नहीं
हमेशा रही आश्रित
हमेशा कहलाई सहगामिनी !
                      - मुखर .

Friday, February 28, 2014

अतुलनीय प्रेम

ये रिश्ते नाते मानव जनित हैं और बहुत ही खूबसूरत होता है हर रिश्ता. प्रेम के जितने रूप उतने ही रिश्ते ! 
मगर रिश्तों पर ऊँगली उठाना भी मानव प्रकृति ही है. वह भी क्या करे, मजबूर है अपनी मानसिक अवस्था से जो सींचित है परम्पराओं से, रूढ़ियों से...हर रिश्ते के साथ बांधे हुए अपेक्षाओं के बोझ से . और मुझे तो अन-अपेक्षित प्रेम अत्यधिक आकर्षित करता है. बिना रिश्ते के, बिना बंधन के, बिना कारन के ...एक दुसरे की ख़ुशी में मुस्कुराते होठ , दुसरे के लिए दुआ में उठे हाथ सबसे जुदा से और उत्तम मजहब से लगते हैं ! ईश्वर दीखता है उनमें ! 
घर में पालतू दो विभिन्न प्रजाति के प्राणियों में, जैसे की कुत्ते और बिल्ली में. गाय द्वारा असहाय बन्दर के बच्चे को दूध पिलाना और यहाँ तक की शेर द्वारा अपने 'शिकार' समान जीव को संरक्षण देना इत्यादि हमने कितनी ही बार अपने आस पास नहीं तो विभिन्न मीडिया श्रोतों में देखा है .  
क्या शिक्षा मिलती है इससे ? अरे शिक्षा को छोडिये मन में कैसे भाव आते हैं? हैं न अतुलनीय प्रेम ! रिश्तों से अपेक्षाओं की जलकुम्भी काटिए और हर रीती -रिवाज परम्पराओं पर प्रश्न चिन्ह लगाइए, प्रेम के कटोरे बन जायेंगे ये रिश्ते. 
रिश्तों के मोहताज प्रेम से इत
र देखिये प्रेम को ! यों ही नहीं कहा जाता - प्रेम ही ईश्वर है !