Monday, July 2, 2012


    " खिड़की"

बंद  कमरे और मोटे मोटे परदे  पड़े खिड़की से मन घबरा गया था . मैं उकता गयी  थी . कूलर भी तो न बस! राहत देने का तो नाम नहीं और शोर इतना की पूछो मत...सर दर्द हो जाये...ये गर्मियों की दोपहरी भी तो जाने कितनी लम्बी होती है ! कोई आखिर कितना टी.वि देखे, मैगजीन पढ़े ? किट्टू भी तो बस चाची के यहाँ क्या गया आने का नाम ही नहीं. मैं भी तो इनकी बातों में आ कर कुछ प्लान नहीं कर पाती. अगली बार तो कसम है मुझे जो इनकी झूठी वादों में आई ! पता नहीं ये गर्मी, पसीना, शोर है या अकेलापन...आखिर क्या अखर रहा है मुझे ?
कूलर ऑफ कर पार्क की और खुलने वाली खिड़की खोल ली | देखा, पेड़ो पर से नीचे उतर आई हरियाली पीली पड़ पृथ्वी पर पसरी पड़ी थी | दोपहरी की आषाढ़ी धूप से धूज कर जीवन हलचल कहीं दुबकी हुई थी...सांय सांय साँस लेता था सन्नाटा | बस किसी टिटहरी की उन्हुहूँ उन्हुहूँ  या तो दूर चलते कमठे की ठक ठक |
जिस चिलचिलाती धुप में चिड़िया भी पर न मरती हो...कुल्फी वाले को सड़क नापते देख उसके टन- टन के साथ एक गीत जहन में उभरा - तुझको चलना होगा...

देखते ही देखते या यूँ कहें सुनते ही सुनते  धुन बदल गयी | कमठे पर पत्थर तोड़ते और रेत की ढेरी पर खेलते उनके कुछ अधनंगे से बच्चे कुल्फी वाले को घेर कोलाहल करने लगे...
तभी कहीं कोई कोयल कूक उठी | जीवन के कानों में अमरस घोल गयी | आसमान में होड़ लेते थे सूरज से दो चटकीले चोकोर | पसीने से तर किशोरों के बदन को कभी गर्मी लू लगी है ?
ध्यान से देखा दूर नीम के दरख़्त के पीछे बेंच पर दो जोड़ी हाथ एक दुसरे को थामे कॉलेज की क्लास बंक कर रहे थे !
कौन है देखने की जिज्ञासा में मैं पार्क में खुलती अपनी खिड़की पर कुछ ज्यादा ही झुक गयी थी की एक मोटी सी बूँद मेरे नाक पर पड़ी | झरोखे पर बैठे किसी कबूतर की आशंका कर अभी इधर उधर
नजर दौडाई ही थी कि कुछ और बूंदे आस पास गिरी और सौंधी सी महक उठी. मेरा मन मयूर भी नाच उठा. कलेंडर देख ही रही थी कि फोन कि घंटी बज उठी - 'मम्मी, शाम कि बस से घर पहुँच रहा हूँ, बस स्टैंड - पुराणी चुंगी पर लेने आ जाना. '
'हेलो, कहाँ बीजी रहता है तुम्हारा फ़ोन? '

"तुम भी कमाल करते हो, किट्टू से बात कर रही थी और कहाँ बीजी हो सकती हूँ . तुम बोलो क्या बोल रहे थे ? '
' हाँ, मैं भी वही कह रहा था | किट्टू के स्कूल से फोन आया था. छुट्टियाँ बढ़ गयी हैं | सामान पैक कर लेना, ३-4 दिन रणथम्बोर  चल के आते हैं. बुकिंग करा ली है मैंने. "
केलेंडर में देखा - तीन दिन बाद सावन लग रहा है...टप .. टप ..टिप.. टिप ....

Saturday, May 19, 2012

“यों ही बस आँख लग गयी थी …”

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नॉएडा  में  फिर  दुराचार  
कल  देर  रात  डिस्को  से  लौटते  हुए  अपने  एक  दोस्त  से  5 लड़कियों  ने  सामूहिक  दुराचार   किया . और  छत - विछत  हाल  में  द्वारका  से  दूर  एक  पार्क  के  पीछे  बेहोशी  की  हालत  में  पटक  गये . सुबह  सैर  पर  आये  लोगों  ने  पुलिस   को  इत्तिला  दी . छान  बीन  में  पाया  गया  की  वह  लड़का  उन  लड़कियों  का  कॉलेज  फ्रेंड  था  और  डिस्को  में  दोस्तों  के  साथ  शराब  भी  पी  थी . पुलिस  ने  माता - पिता  को  हिदायत  देते  हुए  उसे  घर  ले  जाने  को  कहा  की  अपने  लड़के  को  संभाले , यों  देर  रात  घर  से  बहार  निकलना  अच्छी बात  नहीं . जब  हमारे  संवादाता  ने  पूछा  की  जांच  कहाँ  तक  पहुंची , पुलिस  महानिदेशक  ने  कहा  की  हमने  लड़के  के  बारे  में  पता  किया  है . कालोनी  वाले  कहते  हैं  की  वह  अकसर  बनियान  में  बालकोनी  में  खड़ा  दिखता  था . आस  पास  मार्केट  भी  अकसर बरमूडा  या  शोट्स  में  ही  निकल  जाता  था . अब  ऐसे  कपडे  लड़के  पहनेंगे  तो  ऐसी  ही  घटनाएं  होंगी . हम  तो  कालेजो  में  निर्देश  जारी  करने  वाले  हैं . कोई  भी  लड़का जींस टी -शर्ट  में  नहीं  आये . टाइट कपडे  पहन  कर  अपने  6-8 abs दिखायेंगे  तो  और  क्या  आशा  करते  हैं  क्या  होगा ? (महानिदेशक सा'ब के टन से लग रहा था की संवाददाता को ही दन्त रहे हैं. संवाददाता ने नोटिस किया उसने जींस पहनी हुई थी!!
Uniform  पहनना  ही  सही  है . कुरता  पजामा  या  फिर  ज्यादा  से  ज्यादा  धोती . सर  पे  भी  टोपी  compulsory  कर देना  चाहिए . जिसे  देखो  वोही  जस्टिन बीबर  बना  फिरता  है .
संवादाता  द्वारा  सिक्यूरिटी  पर  लिए  गए  कदम  पर पूछने  उन्होंने  कहा  ‘अब  हम  देखेंगे की  किसी  भी  डिस्को  थेक या  बार  में  रात  9 बजे  के  बाद  कोई  लड़का  न  तो  जॉब  करे  न  ही  डांस  पार्टी  में  involve   हो . थोड़े  से  पैसों  के  लिए  अपने  इज्ज़त  और  जान  से  खिलवाड़  करने  का  क्या  औचित्य ?  बर्थ डे  पार्टी  वगरह  के  लिए  पिता  अपने  बच्चों  के  लिए  दिन  के  समय  या  अपने  घर  में  पार्टी  आयोजित  कर  सकते  हैं .
आज  कल  ये  जो  rash driving   हो  रही  है  उसके  बारे  में  आप  क्या  कहेंगे . ‘ आज  कल  माएं  अपनी  बच्चियों  को  कम  उम्र  ही  में  car दे  देती  हैं . हालाँकि  हमने  जब  भी  ट्राफिक   नियम  में  उन्हें  पकड़ा  है , मोटी  रकम  ली  है  चालान  में . मगर  पिता  माता  का  भी  तो  फर्ज  बनता  है  न  की  बच्चों  की  जिद  समय  से  पहले  न  पूरी  करें . नियम  कानून  का  ध्यान  रखे . काली  फिल्म  चढ़ी  कार  drive  करती  लड़कियों  द्वारा  जुर्म  करने  के  वारदातें  बढ़  गयी  हैं . सही  तो  यही  होगा  की  समाज  और  खास  कर  पिता  अपने  लडको  को  संस्कार  दे . यों  देर  रात  लड़कियों  संग  घूमना , डिस्को  जाना  और  शराब  पीना , डोले  शोले  दिखाते उकसाने वाले कपडे  पहनना  कोई  अच्छी  बात  थोड़े  ही  है ?
पुलिस  का  कहना  है  की  security तो  लगभग  अच्छी  ही  है . बस  हादसे में शिकार लड़के  के  चरित्र  पर  ऊँगली  उठ  रही  है .  वो  लडकियां  कौन  थी  उसका  अभी तक  कोई  सुराग  नहीं  मिल  पाया  है . कालोनी  वासी  कहते  हैं  की  ऐसी  वारदातों  से  वे  दहशत  में  जीने  को  मजबूर  हैं . शराब , cigarette  गुटखा  दुकानों  को  अब  सार्वजनिक  स्थानों  से  दूर  और   पास ही  अब  मर्द  पुलिस की गस्त  लगाने  की  मांग  उठ  रही  है . colleges और  call centers पर  दबाव  है  की  लड़कों  के  लिए  अलग  से  परिवहन  की  व्यवस्था  की  जाये . यहाँ  तक  की  लड़कों  की  night  शिफ्ट  न  लगाने  की  मांग  भी  उठी  है .
सवाल  ये  है  की  क्या  पूरे  कपडे  पहनने मात्र  से  या  मर्द  पुलिस  लगाने  से  ये  दुर्घटनाएं  ख़त्म  हो  जाएँगी ? पुरुष  आयोग  के  अध्यक्ष  का  कहना  है  की  ये  सब  समाज  और  पुलिस  व  सरकार अपने  कर्तव्यों  से  पल्ला  झाड़ने  का  सस्ता  रास्ता  ढून्ढ  रहे  हैं . समाज  को  अपना  नजरिया  बदलना  होगा . लड़कों  को  भी  अपनी  आजादी  अच्छी  लगती  है . आखिर  कब  तक  यह  आधी  दुनिया  घुट  घुट  कर  जीती  रहेगी ?.....
अरे उठो भी, चाय ठंडी हो रही है. तुम भी क्या अखबार पढ़ते पढ़ते सो जाती हो !....
ओह्ह ! तो मैं नींद में भी अखबार ही पढ़ रही थी???

Friday, May 11, 2012


      " उड़ गयी गौरैया  "

मैं किताब ले कर खिड़की पर आ कर बैठी ही थी की किसी के रोने की आवाज सुन चौंक गयी. बाहर वो दोनों बैठी शायद सुख दुःख बाँट रही थी. ये औरतें भी न जब देखो दुखड़ा ले कर बैठ जाती हैं...
"हुआ क्या ? बता तो ! रो रो कर जी हलकान किये हुए है, चोंच भी खोलेगी कि नहीं."
 "अब क्या बताऊँ बहना, आज की बात तो है नहीं, कहानी लम्बी है -

 बहार छाई थी...शहर फूलों की वादी हो गया था और चाहत का मौसम शबाब पर था. उसने मुझे इतने प्यार से देखा की मैं दिल हार बैठी."
उनकी बातें मुझे अच्छी लग रही थी. किताब बंद कर कोफ़ी ले आई और कान लगा कर बैठ गयी सुनने उनकी राम कहानी. आगे -
"फिर तो जैसे जिंदगी जश्न हो गयी...हम दोनों बहुत खुश थे...धरती पर पाओं ही नहीं पड़ते थे...सारा सारा दिन आकश नापते फिरते थे...बस चहकते ही रहते  थे. इश्वर का आशीर्वाद था की मेरे पैर भारी हुए. हमारे खुशियों के जैसे पर निकल आये..."
अब तक की कहानी सुन मेरे होठों पर मुस्कान तैरने  लगी थी. कितनी रूमानी थी न...
"अब घरौंदा के लिए हमने अच्छी सी जगह देखना शुरू किया. इधर देखा उधर देखा. दिन दिन भर मेहनत करते. पेड़ जो अब कम ही हैं. जो हैं वो उतने हरे भरे नहीं है. जो थोड़ी सी शाखाएं दिखती हैं वो धूप आंधी व् दुश्मनों की निगाह से सुरक्षित नहीं है."
मुझे बहुत गुस्सा आया हम मानवों पर . न खुद सुरक्षित रहेंगे न पर्यावरण को ही रहने देंगे. और इन मासूम बेजुबानो की तो कोई सोचता ही नहीं...
 "ख़ैर, हमने एक जगह ढून्ढ ही ली. इस घर के ऐ सी के डब्बे के पीछे घोंसला बना शुरू किया."
मेरा दिल धडका...
"पर  हर तीन चार दिन में सारे तिनके बिखरे मिलते. सहारा ही न था वहां ठीक से. पर चिड़ा है न बड़ा समझदार. बड़े करीने से किसी तरह घोंसला बना ही था कि फिर बिखरा मिला. मैंने एक दिन देखा इस घर में रहने वाली ही ने बनने से पहले ही उजाड़ दिया था मेरा घर. मैंने कितनी ही कोशिश की उड़ उड़ कर उसके आस पास कि उसे कुछ समझ आये कुछ दया ही आये. मगर जैसे वो अंधी ही थी. इधर मेरे दिन पूरे हो रहे थे."
अब तक जैसे मुझे लकवा मार गया था. मेरे चहरे पर हवाईयां उड़ रही थी...
" कुछ चिंता की वजह से कुछ मौसम के बदलाव से मैंने अंडे समय से पहले ही दे दिए. वही ऐ सी के पीछे दिए, क्या करती ? और कोई चारा भी तो न था ! बहुत प्रार्थना की थी मैंने प्रभु से हमारी और इन अजन्मे मासूमों की रक्षा के लिए. मगर कल रात आई आंधी में उजड़ गया मेरा घरोंदा."
"पर मैंने तो देखा है इसे फेसबुक पर 'चिड़िया बचाओ' गौरईया बचाओ' के पोस्ट डालते हुए. और बहुत से 'लाईक्स' कमेंट्स लेते देते हुए. ये ऐसा कैसे कर सकती है?"
"हाँ, इसने घर के बहार परिंडा भी बाँधा...रोज दाना पानी भी देती है...पर घोंसला भी तो चाहिए होता है न? हमारे लिए न सही, कम से कम होने वाले चूजों के बारे में तो सोचती!! सिर्फ फेसबुक पर अभियान चलाने  से तो कुछ नहीं होगा न."
मेरे कान फटे जा रहे थे. आंसू की अविरल धारा बही जा रही थी. मैं घोर दोष में दबी जा रही थी...क्या करती ! अब तो मेरे हाथों से तोते ही नहीं गौरैयां भी उड़ चुकी थी...                                                                मुखर.

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Thursday, April 26, 2012

"दंभ - The Attitude"
पड़ोस में एक new family आई है.
Thank God, इस बार वाले,
थोड़े standard के हैं.
वो housewife है, पर
Graduate तो लगती है !
एक अच्छी बात और है,
दो छोटे छोटे kids से
घर उनका गुलजार है.
(मुझे दूसरों के बच्चे
अच्छे लगते हैं.
अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं ,
और innocent acts ,
तोतली बोली भी,
देखने सुनाने को मिलती है.)

सासु माँ साथ रहती है...
बहु बेचारी, दिन दिन भर,
बच्चों और इनके लिए ही,
Busy busy सी फिरती है.
बाहर कम ही दिखती है.
Tipical ! Very Tipical !!

Dresses की choice भी बस्स्स ...
Jeans - Capries में कम ही देखा है.
हमेशा सूट में ही दिखती है.
रात में gawn पहनती है.

I made it a point -
की मुझे car drive करते हुए,
Park करते हुए,
'Mod ' कपड़ों में घुमते हुए,
और goggles उतारते हुए,
Phone पे English बोलते हुए,
सास बहु notice तो करती हैं?

संक्रांति पे उन्होंने
घर के बने  हुए,
तिल के लड्डू मुझे दिए,
I felt odd !
पर मैं समझदार हूँ,
Humbly recieve किये.
साथ में add किया-
" Kitchen में मुझे
कम ही interest है"
(OMG ! कहीं मुझसे भी
Expect न करने लग जाएँ!
और ये सिलसिला
आगे बढ़ जाये !!)

मुझे वो नाम से नहीं,
'भाभीजी' बुलाती है,
ऐसा कहते ही मुझे,
'बहनजी' feel कराती है !

आज सुबह देखा,
बाहरधुप में बैठी,
सासु तोड़ रही थी मैथी,
और नीचे बैठ कर बहु,
उनके पाँव पर
तेल मालिश कर रही थी.

मेरी आँखे झुक गयी.
जाने किस गुमान में,
मैं जी रही थी?
कैसी कैसी बातों में
'उसे-मुझे' तौल रही थी?
और मुझे realise हुआ,
No doubt , उसका standard
मुझसे कहीं ऊंचा है!

अपने profession से मैं अब,
थोडा समय बचाऊँगी,
अपनी नयी पड़ोसन से,
थोडा मेल-जोल बढ़ाउंगी .
कुछ ऐसा मैंने सोचा है !
                      - मुखर

Friday, February 17, 2012

Love In The Air..

"लव इन द एयर "
सुबह चाय की चुस्कियों के साथ अख़बार ले बैठी थी की पढ़ा 'लव इन द एयर' . मन ही मन बुदबुदाई की अब क्या हो गया?  प्यार हवा हो गया ? वो तो कब का हो गया जी !  करियर oriented  माँ बाप को बच्चों  के लिए वक़्त नहीं.  बूढ़े हो गए माँ बाप के लिए बच्चों के पास 'टाइम' नहीं.  प्यार क्या ख़ाक खा कर सीखेंगे? बस हवा में ही हाथ चलते हैं...
फिर सोचा मैं नींद में तो नहीं...ध्यान से फिर पढ़ा . उसमे लिखा था - 'लव इन द एयर'.  हाँ, सही ही कहा - लव इज एज  थिन एज  एयर. बेचारा malnutritious  हो गया. आज कल कि हवा ही कुछ ऐसी है कि कच्ची उम्र ही में लग जाता है नमक इश्क का ...और इस उम्र में ज्यादा नमक हड्डियों को गला देती है...और फिर बिना अनुभव की आंच दिए कच्चा पक्का ही परोस दिया जाता है ये इश्क...बच्चों में सब्र भी तो नहीं...फिर इश्क ही को कहाँ मालूम सब्र? ...लेने वाला भी contaminate हो जाता है, इम्मुनिटी कहाँ इतनी स्ट्रोंग है इन बच्चों कि? फिर मुझे लगा, मैं चालीसी के पहले ही में सठिया रही हूँ , बिना ठीक से पढ़े ही मिमिया रही हूँ...और काहे को भला इस विदेशी भाषा कि टांग तोड़ रही हूँ ..आयातीत  त्यौहार है ...इम्पोर्टेड है...एलोपेथी ही कि तरह चुटकी ही में असर करती होगी...चश्मे के बगैर कुछ सूझता भी तो नहीं. हो सकता है  एयर में वाकई लव हो...ये कहानी तो अब हमसे आधी उम्र वालों को belong करती है. अब हमे इस प्रोढ़ अवस्था में  प्यार -व्यार तो क्या ही सूझेगा...सुहानी बसंती हवा तक तो हड्डियों को कंपा जाती है...और भरोसा नहीं इम्पोर्टेड चीज के कुछ साइड इफेक्ट्स  हुए तो? सोचते सोचते अभी  पन्ना पलटा ही था पढ़ कर एकदम सन्न ही रह गए ..हाथों से चाय पेपर ही पे छलक गयी...किसी ने अपने 'लव' को लटका दिया था...हवा में...
मेरी ये हालत देख कर मेरे लव ने कहा क्यों सुबह सुबह इस नामुराद अख़बार में सर खपाती हो, लो मैं तुम्हारे लिए एक और चाय बना लता हूँ.  साहब तो गए किचन में , और मैं बगीचे में फूलों और चिड़ियों की चहचहाहट के बीच वाकई  'लव इज इन द एयर' महसूस करती हूँ ...
पड़ोस की मिसेज वर्मा से कहा,-कितना सुहाना मौसम है न बसंत का, आपका valentine कहाँ है ? उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया - मैंने तो बीरबल की खिचड़ी की तरह अपने लव को दूर हवा में लटका रखा है, और दूर से आती भीनी भीनी महक से ही खुश हूँ...is love still in the air? or gone with the wind?

Saturday, February 11, 2012

"अबला"



 - ५ फरवरी २०१२- जयपुर, एक लड़की रेल से कट कर मर गयी. वह आगे आगे भाग रही थी और चार लड़के पीछे थे....
  "अबला"
अच्छा हुआ वह मर गयी,
क्योंकि अगर,
वो आज नहीं मरती,
तो रोज रोज ही मरती,
पल पल मरती,
तिल तिल मरती,
अपनों के 'हाथो' मरती,
रिश्तो के 'हाथो' मरती,
अपने खुद के मूल्यों,
संस्कारों के हाथो मरती.

किसने बनाये ये मूल्य?

किसने दिए ये संस्कार?
ये कौन 'अपने' हैं?
ये कैसे 'रिश्ते' हैं?
किस जुर्म की सजा मिली?

और आखिर क्यों?

क्योंकि वो स्त्री है?

सच कहते है वो-

की स्त्री अबला है!
की स्त्री मूर्खा है!!
गर अबला न होती,
गर मूर्खा न होती,
क्यों ढोती झूठे मूल्य,
क्यों ओढती 'कू' संस्कार  ?

क्यों वो अपनी बेटी को,

सिखा पढ़ा कर,
'चरित्र' का पाठ,
गढ़ देती है एक
कांच की गुडिया ,
जो उठी एक ऊँगली भी
तोडना तो दिगर,
सह भी नहीं पाती,
और समाज की बेदी पर
हो जाती है होम...


वो तो चली गयी,

रोज ही जाती है,
कितनी ही जाती हैं,
पर स्त्री के आँचल में अब भी,
झूठे मूल्य, झूठे संस्कार,
 कौन कितने 'अपने' हैं
ये  कैसे  'रिश्तेदार',
और बेदर्द समाज,
एक बोझ बने पड़े हैं
एक प्रश्न बने खड़े हैं !

हाँ स्त्री मूर्खा है !

हाँ, स्त्री अबला है!!

                  - मुखर